आयुष्मान योजना में सेंध लगा रहे ‘मित्र’, एक इंजेक्शन की जरूरत पर तीन मंगाते

डिमांड से ज्यादा दवाएं स्टोर से मंगाकर करते खेल
शक पर सीएमएस ने की जांच तो सामने आया सच

कानपुर। गरीब मरीजों के इलाज के लिए हैलट में चल रही आयुष्मान योजना की आड़ में आयुष्मान मित्र ही फर्जीवाड़ा कर रहे हैं। उनकी पोल तब खुली जब हो रहे खेल पर शक के चलते सीएमएस ने जांच की। पता चला है कि इलाज करने वाले डॉक्टर ने मरीज को बीएचटी पर एल्ब्यूमिन का एक इंजेक्शन लिखा, मगर आयुष्मान मित्रों ने तीन इंजेक्शन की डिमांड अस्पताल के स्टोर में भेज दी। डिमांड और बीएचटी का मिलान करने पर सच सामने आया। आयुष्मान रोगियों की दवाओं की खरीद में पहले भी खेल पकड़ा जा चुका है।

महंगे इंजेक्शन ज्यादा मंगाते
हैलट अस्पताल में गुर्दे की बीमारी से पीडि़त मरीज के नाम पर पांच दिसम्बर से एल्ब्यूमिन इंजेक्शन जारी हो रहा है। सीएमएस डॉ. रीता गुप्ता ने जारी हो रहे इंजेक्शन को जब क्रॉस चेक किया तो पता चला कि बीएचटी पर एक इंजेक्शन की मंजूरी दी गई है पर डिमांड अधिक भेजी गई है। इस पर उन्होंने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि एल्ब्यूमिन काफी महंगा इंजेक्शन है। यह बाजार में सात हजार रुपए तक मिलता है। मगर अस्पताल में 3100 रुपए में एक इंजेक्शन मिलता है। यह इंजेक्शन लिवर और किडनी के मरीजों के लिए होता है।

पैकेज से ज्याद इलाज नहीं
मरीज का पैकेज जितना है उतने में ही उसका इलाज होना है। डॉ. रीता के मुताबिक अगर कंसलटेंट ने लिखा है तो दिया जाएगा, मगर एक सीमित दायरे में ही मरीज को दवा दी जा सकती है। अगर एक मरीज की बीमारी का पैकेज 30 हजार है तो उसे सिर्फ एक ही इंजेक्शन 30 हजार रुपए का कैसे उपलब्ध कराया जा सकता है। फिर भी इलाज नहीं रोका जाता है।

केवल कागज पर होता इलाज
वार्ड नम्बर दो में तीन आयुष्मान रोगी भर्ती हैं। तीनों का कहना है कि दिनभर में तीन चार बार रजिस्टर पर नाम लिखाते हैं और नाम भी पूछा जाता है मगर न तो दवा मिलती है और न ही कोई दूसरी सहूलियत। अनिल एक महीने से भर्ती है। उसका कहना है कि कोई फायदा नहीं है। दर्जन भर बार हस्ताक्षर कराए जा चुके हैं।

डॉक्टरों से कराएं दवा का सत्यापन
कई बार शिकायत हुई हैं कि आयुष्मान नोडल सेंटर पर मौजूद आयुष्मान मित्र अतिरिक्त दवाओं को मंगा रहे हैं। कंसलटेंट को पता नहीं रहता है कि कितनी दवाएं मंगाई हैं। आयुष्मान मित्रों को दवाओं का सत्यापन डॉक्टरों से कराना चाहिए कि कितनी दवाएं लिखी थीं और मरीज को कितनी मिली हैं।

आलोक पाण्डेय
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