पूर्व मंत्री के आगे इस नेता की रणनीति हुई फेल, कांग्रेस के दो बागियों ने भी किया सरेंडर

राजनीतिक दलों के अंदर टिकट वितरण को लेकर जमकर घमासान हुआ...

कानपुर. निकाय चुनाव की डुगडुगी बजते ही राजनीतिक दलों के अंदर टिकट वितरण को लेकर जमकर घमासान हुआ। नामांकन के आखरी दिन भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस 75 से ज्यादा बागियों ने पर्चा भर कर खलबली मचा दी। सबसे ज्यादा विरोध के स्वर कांग्रेस के अंदर से निकले। यहां पूर्व मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और पूर्व विधायक अजय कपूर की रार खुलकर सामने आ गई और और मेयर पद की प्रत्याशी वंदना मिश्रा के खिलाफ ऊषा रत्नाकर शुक्ला और ममता तिवारी को चुनाव के मैदान में उतार दिया। इसी दौरान बात हाईकामन तक पहुंच गई और गांघी परिवार के करीबी नेता के दखल के बाद पूर्व विधायक को अपने पैर पीछे खीचने हुए दोनों बागियों का सरेंडर करवा दिया। जिससे अब भाजपा का समीकरण बिगड़ता दिख रहा है और मेयर प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।


ऊषा और ममता मेयर चुनाव से हटीं

नोटबंदी व जीएसटी जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस इस बार 15 साल बाद मेयर पद भाजपा से हथियाने का सपना देख रही थी। टिकट पान के लिए कई नेता लखनऊ से लेकर दिल्ली में दौड़ लगाते रहे। लेकिन एकाएक स्कूल प्रबंधक की पत्नी को पंजा का सिंबल थमा दिया गया, इसी के बाद पार्टी में एक धड़ा विरोध में खड़ा हो गया। टिकट नहीं मिलने से खफा ऊषा रत्नाकर शुक्ला ने खुलकर आरोप लगाते हुए कहा था कि पूर्व मंत्री के कहने पर हमारी जगह बंदना मिश्रा को टिकट दिया गया। ऊषा रत्नाकर शुक्ला ने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर कांग्रेसियों की नींद-हराम कर दी। इसी के बाद पूर्व मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल एक्शन में आए और कानुपर की रिपोर्ट पार्टी हाईकमान के पास पहुंचाई। कांग्रेस के एक कद्दावर नेता के दखल के बाद पूर्व विधायक अजय कपूर को सरेंडर करना पड़ा। पर्चा वापसी के आखरी दिन ऊषा रत्नाकर शुक्ला और ममता तिवारी ने मेयर पद से अपने-अपने नाम वापस कर लिए। जीत का दावा कर दिया।


मेयर की कुर्सी भाजपा के लिए कठिन हुई

ऊषा रत्नाकर शुक्ला और ममता तिवारी के नामांकन वापस लेने के बाद भाजपा प्रत्याशी प्रमिला पाण्डेय की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। राजनीति के जानकार डॉक्टर अनूप सिंह ने बताया कि यह सच है कि कानपुर में ब्राह्मण मतदाताओं की तादाद अच्छी है पर सपा से वैश्य प्रत्याशी होने से भाजपा पर असर पड़ना तय है। इसके साथ ही बगावत करने वाली दोनों प्रत्याशियों के नामांकन वापस होने से कांग्रेस का भी मजबूत होना तय है। ऐसे में भाजपा प्रत्याशी को जीत के लिए अब समीकरण बदलने पड़ेगें और मेहनत भी अधिक करना पड़ेगा। डॉक्टर सिंह कहते हैं कि मेयर का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगा। शहर के तीन लाख से ज्यादा मुस्लिम मतदाता खामोश हैं और जीत-हार में अहम रोल अदा करेंगे।


जोड़- तोड़ का शुरू हुआ सिलसिला

राजनीतिक गलियारों से जो खबर निकल कर आ रही है उसके मुताबिक कई प्रत्याशियों ने सिर्फ इसलिए नामांकन कराया है कि मजबूत प्रत्याशी कुछ चढ़ावा चढ़ाकर खुश कर देंगे तो वह नामांकन वापस ले लेंगे। इसमें डमी कैंडिडेट की संख्या सबसे ज्यादा है। डमी कैंडिडेट भी चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं, कई वार्डो में तो जिताऊ उम्मीदवार के लिए मुसीबत बन गए हैं। ऊष रत्नाकर और ममता तिवारी के नाम वापस लेने के बावजूद मेयर पद के लिए अनीता देवी-निर्दलीय, सुमन मिश्रा-शिवसेना, शमीम बानो, राष्ट्रीय लोकदल, लक्ष्मी देवी-बहुजन पार्टी, जानकी गुप्ता-निर्दलीय, मीना सिंह, वीरमती- निर्दलीय, शबाना उस्मानी- निर्दलीय चुनावी अखाड़े में अपनी दांव पेंच आजमा रही है।


कुछ तरह से बोले नेता

भाजपा जिलाध्यक्ष सुरेन्द्र मैथानी का कहना है कि किस पार्टी में बगावत हो रही या नहीं इसका असर भाजपा पर कुछ नहीं पड़ने वाला है। भाजपा सबका साथ सबका विकास नीति में विश्वास करती है जिसके चलते जनता लगातार पार्टी के पक्ष में जुडती जा रही है। जनता के रूझान से साफ पता चल रहा है कि महापौर ही नहीं पूरे नगर निकाय चुनाव में पार्टी की भारी जीत होने जा रही है। कांग्रेस के महानगर अध्यक्ष हर प्रकाश अग्निहोत्री ने दावा किया कि दोनों बगावती नेत्री पूरी मेहनत व लगन से काम करेंगी। नोटबंदी, जीएसटी व भाजपा सरकार से जनता पूरी तरह से त्रस्त हो गई है जिसका जवाब इसी नगर निकाय चुनाव में जनता देने जा रही है और कांग्रेस की जीत होना तय है।

नितिन श्रीवास्तव
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