गेहूं उगाने के लिए नहीं पड़ेगी पानी की जरूरत, होगा बम्पर उत्पादन

गेहूं उगाने के लिए नहीं पड़ेगी पानी की जरूरत, होगा बम्पर उत्पादन

Alok Pandey | Updated: 23 Aug 2019, 12:53:01 PM (IST) Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

125 दिनों में तैयार हो जाएगा सीएसए की नई प्रजाति का गेहूं
45-55 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन एक पानी देने पर

कानपुर। क्या बिना पानी के भी गेहूं उगाया जा सकता है और वह भी बम्पर उत्पादन के साथ, सुनने में असंभवन लगता है, लेकिन चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के वैज्ञानिकों ने यह संभव कर दिखाया है। यहां के वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी प्रजाति तैयार की है, जिसकी पैदावार बिना पानी के होगी। सीएसए के शोधकर्ता वैज्ञानिक डॉ. सोमवीर सिंह और डॉ.आशीष यादव के मुताबिक सूखे से निपटने के लिए कई वर्षों बाद नई प्रजाति जारी की गई है। उनके मुताबिक इस समय सूखे और तापमान में बढ़ोतरी से रबी की फसलों खासकर गेहूं पर बुरा असर पड़ रहा है।

पानी लगाने पर बढ़ जाएगा उत्पादन
अगर किसान फसल में एक-दो पानी लगाते हैं तो उत्पादन 10-20 कुंतल प्रति हेक्टेयर अधिक मिलेगा। भारत सरकार की सेंट्रल वेराइटल रिलीज कमेटी ने गेहूं की इस नई प्रजाति को देश के किसानों के लिए जारी कर दिया है। के-1317 प्रजाति सफल ट्रायल के बाद किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है। नई प्रजाति को पानी मिले या नहीं मिले पैदावार ठीक ठाक होगी।

बुंदेलखंड के लिए बेहतर प्रजाति
बुंदेलखंड में इसकी पैदावार बेहतर देखी गई है। नॉर्थ ईस्ट प्लेन जोन यानी उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़,असोम के विभिन्न एग्रोक्लाइमेटिक जोन में भी इसकी बम्पर पैदावार मिल रही है। डॉ. सोमवीर सिंह का कहना है कि के-1317 प्रजाति के गेहूं की चपाती उत्कृष्ट कोटि की बनती है। यह खुले में रखने पर भी जल्दी सूखती नहीं और स्वाद भी बढिय़ा है। नई प्रजाति के गेहूं में प्रोटीन और जिंक की मात्रा भी अब तक चलन में जितनी भी प्रजातियां हैं, उनसे बेहतर है। इसमें 12.5 प्रतिशत प्रोटीन और 37.5 प्रतिशत जिंक मिल रहा है।

असिंचित क्षेत्रों के लिए वरदान
सीएसए के शोध निदेशक डॉ.एच जी प्रकाश ने बताया कि असिंचित क्षेत्रों के लिए गेहूं की नई प्रजाति तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं है। वैज्ञानिकों की टीम आठ वर्षों से मेहनत कर रही थी। अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने नई प्रजाति को पूरे देश के असिंचित क्षेत्रों के लिए बेहतर माना है। आने वाले सीजन में किसान इसकी बुआई कर सकते हैं।

 

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