हैलट और उर्सला को चढ़ा बुखार, मुख्यमंत्री जी तत्काल करें इलाज

कानपुर के दोनों बड़े अस्पतालों के हालात खराब, मरीजों का डॉक्टर्स नहीं करते इलाज, एडमिट के बजाए वार्ड से कर रहे है बाहर

By: Vinod Nigam

Published: 24 Jul 2018, 06:50 PM IST

कानपुर। यूपी की सत्ता संभलते ही सीएम योगी आदित्यनाथ ने बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने का वादा किया था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद हाल पहले से ज्यादा खतरनाक हो गए है। कानपुर के दो बड़े सरकारी अस्पतालों में आएदिन मरीजों का डॉक्टर उत्पीड़न कर रहे हैं। किसी ने विरोध किया तो उन्हें पीटा जाता है। ऐसा ही एक मामला सेमवार को सामने आया, यहां उन्नाव में सड़क हादसे में घायल दो दोस्तों का हैलट इमरजेंसी में जूनियर डॉक्टरों ने इलाज नहीं किया। दोनों घायलों को इमरजेंसी से बाहर कर दिया। इसके बाद दवा का बकाया बिल न चुकाने पर मेडिकल स्टोर संचालक ने भी घायलों को रोक लिया। दोपहर में घायलों के एक रिश्तेदार के बिल चुकता करने के बाद परिजन घायलों को वहां से ले जा सके। जबकि उर्सला अस्पताल भी बेलगाम है और यहां भी डॉक्टर्स मरीजों को इलाज के बजाए निजी क्लीनिक में जाने को कह एडमिट नहीं करते। डॉक्टर्स के चलते गरीब मरीज अपना घर-जमीन गिरवीं रख प्राईवेट अस्पतालों में जाने को मजदूर है।
बीमारियों ने दी दस्तक, डॉक्टर्स मस्त
बरसात के मौसम में मानसूनी बीमारियों ने गांव-कस्बों और मोहल्लों में दस्तक दे दह है। मरीज इलाज के लिए दो बड़े हैलट व उर्सला अस्पताल में आते हैं, लेकिन डॉक्टर्स दवा के बदले डंडे के जरिए इलाज कर रहे हैं। सोमवार को जहां हैलट में घायलों का इलाज नहीं किया गया तो वहीं मंगलवार को उर्सला में तमाम मरीज बिना दवा के प्राईवेट क्लीनिक की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। मुलगंज ने फीवर से ग्रसित राजकुमारी कई घंटे लाइन में खड़े होकर पर्चा बनवाया। डॉक्टर्स ने मरीज को देखा और दवा के बजाए जांच के लिए कह दिया। मरीज ने अस्पताल में जांच कराए जाने की गुहार लगाई पर डॉक्टर्स ने कहा यहां बुखार की जांच नहीं होती। आप पैथालॉजी से जांच करा शाम के वक्त हमारे क्लीनिक में आकर दिखा जाएं।
इन्हें नहीं किया गया एडमिट
उन्नाव के मकदूम नगर निवासी राजपाल और शिव बरन सड़क हादसे में घायल हो गए थे। रात करीब नौ बजे परिजन घायलों को लेकर हैलट इमरजेंसी पहुंचे। उनके साथ आए मकदूम नगर के पूर्व प्रधान विनोद ने बताया कि इमरजेंसी में जूनियर डॉक्टरों ने घायलों का पर्चा बनवाया। फिर परिजनों को मेडिकल स्टोर से दवा लाने के लिए पर्चा थमा दिया। परिजन ढाई हजार रुपये देकर दवाएं ले आए। बाकी बिल बकाया कर दिया। परिजनों ने जूनियर डॉक्टरों ने कहा कि बाहर से दवाएं खरीदने के लिए अब पैसा नहीं है। इस पर डॉक्टर भड़क गए और इलाज बंद कर दिया। सोमवार सुबह दोनों को इमरजेंसी से बाहर कर दिया। तीमारदार घायलों को घर लेकर जा रहे थे, तभी मेडिकल स्टोर वाले ने उन लोगों को रोक लिया। कहा बिल चुकाओ, तभी यहां से जा सकोगे। बाद में रिश्तेदार ने बिल चुकाया।
मरीजों की जान के साथ खिलवाड़
उर्सला अस्पताल में सैकड़ों मरीज प्रतिदिन इलाज के लिए आते है । उनके लिए शहर की सबसे व्यस्ततम रोड के दोनों तरफ बने इस अस्पताल में घूमना पड़ता है। इस अस्पताल में एक ओर जहां ओपीडी बनी है। वही दूसरी ओर इमरजेंसी । जिसको जोड़ने के लिए 10 साल पहले एक फ्लाई ओवर बनाया गया था ।फ्लाई ओवर ब्रिज मरीजों को इमरजेंसी से वार्डो में शिफ्ट करने के बनाया गया था जो अब सफेद हाथी के साथ ही नशेबाजो का अड्डा बन गया है। मरीजो कों वार्ड बॉय लापरवाही के चलते अब जाम लगी रोड से निकालते हैं ।कई बार तो स्ट्रेचर में लेटे हुए मरीज को वाहनों की टक्कर लगने से गिरकर और चोटिल होने के कई मामले भी आए। बावजूद जिला अस्पताल के कर्मचारी मरीजों की जान जोखिम में डाल कर भीड़ भाड़ वाली सड़क से ले जाते हैं। मंगलवार को वार्ड ब्वाय एक मरीज को स्ट्रेचर में रख कर दूसरी इमारत में ले गए। मरीज के परिजनों ने उसे फ्लाईओवर से ले जाने को कहा तो वार्ड ब्वाय उग्र हो गए और मरीज को छोड़ जाने लगे। तीमारदार खुद स्ट्रेचर के जरिए मरीज को रोड पार कर ले गए।
कुछ इस तरह से बोले जिम्मेदार
उर्सला के डॉयरेक्टर डॉक्टर उमाकांत न इस प्रकरण पर कहा कि फ्लाई ओवर से ही मरीज को लाने ले जाने की व्यवस्था है। जिसके आदेश भी दिए गए हैं पर जो तीमारदारों की वजह से कुछ कर्मचारी मरीज़ो कों सड़क पार कराकर ले आते है। उनको हिदायत दी गयी है और जो आदेशों की अवहेलना करेगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जहां तक मरीजों के इलाज नहीं करने की बात है तो अगर कोई पीड़ित शिकायत करता है तो उस डाम्टर के खिलाफ जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी। वहीं हैलट के इमरजेंसी मेडिकल ऑफीसर डॉक्टर विनय ने बताया कि सोमवार को उनकी सुबह की पाली में ड्यूटी थी। वह ड्यूटी पर पहुंचे और बाहर पड़े मरीजों के बारे में पूछा। शिव बरन और राजपाल को अस्पताल में भर्ती कराने के निर्देश दिए। परिजनों ने भर्ती कराने से इंकार कर

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