सियासत के धाकड़ पहलवानों को किया चित, भोंपू के बल पर सात दफा चुने गए विधायक

सियासत के धाकड़ पहलवानों को किया चित, भोंपू के बल पर सात दफा चुने गए विधायक

Vinod Nigam | Publish: Apr, 14 2019 09:01:01 AM (IST) Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

विधायक ने बताया कि तब कार्यकर्ता गुड़ और सत्तू के खर्च पर चुनाव लड़ा देते थे, पर अब सिर्फ पैसे के बल पर चुनावी टैम्पों प्रत्याशी करते हैं हाई।

कानपुर। निर्वाचन आयोग की तरफ से लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के लिए 70 लाख रूपए खर्च करने की अनुमति दी है। इसका मोटा हिस्सा चुनाव प्रचार की कमान संभालनें वाली कार्यकर्ताओं की टोली पर खर्च करना पड़ता है। ये लोग उम्मीदवार का टैम्पों हाईक कर जिताने में अहम रोल निभाते हैं। पर ऐसे कई जनप्रतिनिधि रहे, जो बिना धनबल-बाहुबल के जनप्रतिनिध चुने गए। इन्हीं में से सात बार के विधायक भगवती सिंह विशारद (97) हैं, जो साइकिल के कॅरियर पर भोंपू बांधकर प्रचार करते और पूरे सात बार विधायक चुने गए।
बदल गया चुनाव का तरीका
धनकुट्टी में किराए के घर में रहने वाले पूर्व विधायक भगवती सिंह विशारद बताते हैं, देश में पहला चुनाव अंग्रेजी हुकुमत के वक्त 1935 में हुआ, जब बिना पैसा खर्च किए नेता जनप्रतिनिधि चुने गए। लेकिन उसके बाद 94 साल में भारत में चुनाव लड़ने का अंदाज ऐसा बदला है कि 2019 का लोकसभा चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव होने जा रहा है। अब उम्मीदवार वोट के लिए धनबल-बाहुबल के जरिए सियासी दंगल फतह करने के लिए हथकंडा आजमा रहे थे। पर हमारे वक्त कार्यकर्ता सच्चा समर्पित होता था। तब कार्यकर्ता गुड़ और सत्तू के खर्च पर चुनाव लड़ा देते थे।

ऐसे करते थे प्रचार
पूर्व विधायक बताते हैं कि कार्यकर्ता ही नेताओं को चुनाव लड़ाते थे। गांव में चैपाल सजती थीं। लोग अपने-अपने नेता को चुनाव लड़के लिए प्रेरित करता। चुनावी अखाड़े में उतरते ही कार्यकर्ता घर से गुड़ और सत्तू लेकर निकल पड़ते। कई-कई दिनों प्रचार करते। भूंख लगती तो गुड़ के सत्तू खाते। पूर्व विधायक बताते हैं कि पहले हम बिना खर्च के विधायक चुने गए। प्रचार के लिए हमें एक मित्र ने साइकिल दी। सादकिल के कॅरियर पर भोंपू बांधकर निकल पड़ते और इसके जरिए ही अपना टैम्पों हाई करते।

तीन हजार वापस किए
पूर्व विधायक भगवती ने बताया कि 1952 के विधानसभा चुनाव में पीएसपी पार्टी ने कानपुर के जनरलगंज सीट से हमें टिकट दिया, था। लेकिन हम चुनाव हार गया। इसके बाद 1957 के विस चुनाव में पीएसपी पार्टी ने दोबारा से उन्नाव के बारासगवर सीट से चुनाव लड़ाया और हम विधायक चुने गए। इस चुनाव में ग्रामूीणों ने चंदा कर 5 हजार जुटाए। इस पैसे का बड़ा हिस्सा कार्यकर्ताओं को बांट दिया। हमारे पास तीन हजार रूपए बच गए। बची रकम ग्रामीणों के विकास में लगा दिए।

गुम हो गए समर्पित कार्यकर्ता
भगवती विशारद कहते हैं कि उस वक्त पार्टी के लिए कार्यकर्ता समर्पित रहते थे। अपने-अपने उम्मीदवार को जितानें के लिए दिन-रात एक करते थे। पहले के कार्यकर्ता बिना स्वार्थ के जुड़ते थे, लेकिन अब हालात इसके विपरीत हैं। अब तो पैसे के बल पर जनसभाओं में लोग बुलाए जाते हैं। जो दल मालामाल, खर्चीला उम्मीदवार होगा, उसी के बाद कार्यकर्ताओं की फौज होगी। ये ऐसे कार्यकर्ता होते हैं जो सिर्फ पैसे के लिए ही प्रचार करते हैं। पूर्व विधायक कहते हैं, पहले प्रचार सिर्फ प्रत्याशी को जीत दिलानें तक सीमित नहीं था। हर कार्यकर्ता के लिए पार्टी की एक अगल पहचान बनाना भी मकसद होता था।

 

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