अब 60 फीसदी मरीजों पर एंटीबायोटिक नहीं करती असर

अब 60 फीसदी मरीजों पर एंटीबायोटिक नहीं करती असर

Alok Pandey | Updated: 02 Aug 2019, 11:50:02 AM (IST) Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

 

कानपुर मेडिकल कालेज की रिसर्च में खुलासा
नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल को भेजी गई रिपोर्ट

कानपुर। हर बीमारी में दवा के साथ दी जाने वाली एंटीबायोटिक अब बेअसर होने लगी है। जिस वजह से रोगियों के इलाज में मुश्किल आ रही है। यह समस्या एंटीबायोटिक के अंधाधुंध सेवन के कारण खड़ी हुई है। 60 फीसदी मरीजों पर प्राइमरी और सेकेंडरी लाइन की एंटीबायोटिक फेल हो रही हैं। यह खुलासा हुआ है जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की रिसर्च में। डॉक्टरों ने जब प्राइमरी और सेकेंडरी लाइन की एंटीबायोटिक का रोगी पर असर न होते देख रिसर्च की तो इसका पता चला।

गंभीर मरीजों के लिए खड़ी हुई मुश्किल
सबसे ज्यादा दिक्कत गंभीर मरीजों के लिए है। आईसीयू में भर्ती 80 फीसदी मरीजों पर 18-20 प्रकार की एंटीबायोटिक का कोई असर नहीं हो रहा है। अत्यधिक सेवन के कारण एंटीबायोटिक अपने साथ ही दूसरी दवाओं का असर भी घटा रही है। यह भी मिला कि एंटीबायोटिक के अधिक इस्तेमाल से पैरासिटामाल के साथ-साथ कुछ विशेष तरह के विटामिन दवाओं का शरीर में समुचित अवशोषण नहीं हो रहा है। इससे पैरासिटामॉल की डोज बढ़ानी पड़ रही है।

ये एंटीबायोटिक बेअसर
भर्ती होने वाले मरीजों पर प्राइमरी लाइन की संभी एंटीबायोटिक फेल हो चुकी हैं। जिसमें सिप्रोफ्लाक्सासिन 500 मिलीग्राम, सिफेक्जिम, एमाक्सीसिलिन-250, ओफ्लाक्स 200 मिलीग्राम, नारफ्लाक्स 400 मिलीग्राम व इजिथ्रोमाइसिन आदि एंटीबायोटिक शामिल हैं। इसके कारण मरीजों को चुनिंदा सेकेंडरी लाइन यानी सीधे एडवांस एंटीबायोटिक देने की जरूरत पड़ रही है। हालांकि इस स्तर की भी एक दर्जन दवाएं बेअसर हैं।

सुधार की बजाय बिगड़ रहे हालात
एंटीबायोटिक के बेतहाशा सेवन से लोग ठीक होने के बजाय और बीमार हो रहे हैं। सबसे बुरा असर उन मरीजों पर दिखाई पड़ता है, जिन्हें सेप्टीसीमिया है। इसके अलावा यूरीनरी ट्रैक्ट में संक्रमण, सर्जरी के मरीज और आईसीयू में भर्ती या किसी गम्भीर बैक्टीरिया जनित बीमारी से पीडि़त लोगों को अधिक दिक्कत होती है। निमोनिया और दिमागी बुखार पीडि़त बच्चों के इलाज में भी परेशानी आ रही है।

दूसरी दवाओं पर भी असर
मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रेम सिंह का कहना है कि मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती होने वाले 400 और सर्जरी विभाग के 250 मरीजों पर रिसर्च की गई है। इसकी रिपोर्ट से पता चलता है कि अंधाधुंध एंटीबायोटिक के सेवन से मरीजों में दूसरी दवाओं का मैकेनिज्म भी बिगड़ रहा है। इससे असर प्रभावित हो रहा है। मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी लैब की यह रिपोर्ट नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल, नई दिल्ली को भेजी गई है।

बिना जांच के दे रहे एंटीबायोटिक
ज्यादातर मरीजों के लिए डायग्नोसिस के बिना ही एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करना ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसके बावजूद झोलाछाप ही नहीं, दूसरी पैथी के डॉक्टर और सामान्य एमबीबीएस भी इसका मरीजों पर जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। खासकर ग्रामीण इलाके के डॉक्टरों के पर्चों पर हर बीमारी के इलाज में एंटीबायोटिक शामिल होता है। ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी अनिवार्य रूप से मुफ्त एंटीबायोटिक लिख रहे हैं। इससे कोई बीमारी तत्काल तो दूर हो रही है, लेकिन गंभीर बीमारियों के इलाज में रोड़ा खड़ा कर देती है। ग्रामीण क्षेत्रों के डॉक्टरों को जागरूक होना पड़ेगा।

इनका इस्तेमाल किया बंद
डॉक्टरों ने सिप्रोफ्लाक्सासिन व एम्पिसिलीन एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बंद कर दिया है, क्योंकि ये मरीजों पर बिल्कुल असर नहीं कर रहीं। इससे इनकी खरीद बंद कर दी गई है। सिप्रोफ्लॉक्सासिन ओपीडी में बड़ी संख्या में मरीजों को दी जा रही थी। यह दवा बेसिक एंटीबायोटिक के रूप में इस्तेमाल हो रही थी। अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए इंजेक्शन और टेबलेट्स के रूप में दी जाने वाली 30 एंटीबायोटिक में यह दवा भी शामिल है।

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