जब गोपाल दास नीरज ने अखिलेश यादव को दी थी नसीहत, नेताओं तक पहुंचाया अपना संदेश

गोपाल दास नीरज की इन पंक्तियों में दर्द के सिवाय कुछ नहीं है...

By: Vinod Nigam

Published: 20 Jul 2018, 10:07 AM IST

कानपुर. महाकवि गोपालदस नीरज आज हमारे बीच नहीं रहे। उनका गुरूवार को दिल्ली स्थित अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। लेकिन जितने साल जमी पर गुजारे अपने कविताओं के जरिए लोगों को हंसाया तो राजनेताओं को जगाया, वहीं बॉलीबुड में अपनी कलम का लोहा मनवाया। जो खत तुझे...’, ’आज मदहोश हुआ जाए.. ’ए भाई जरा देखके चलो... दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है...शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब..’ जैसे तमाम गानों को लिखकर कवि ने फिल्मों में अपने अलग पहचान बनाई। 93 साल के कवि की मौत पर पूरा शहर रो पड़ा। उनको जानने,पहचाने वाले लोगों का गहरा धक्का लगा। कवि का कानपुर से गहरा नाता रहा। यहीं से उन्होंने शिक्षा-दिक्षा ली और सियासत में उतरने के लिए इसी शहर को चुना। पर कांग्रेस की दगेबाजी के चलते उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस दर्द को लेकर वो निकल पड़े और महानकवि नीरज कहलाए।

 

एम्स में ली अंतिम सांस

मशहूर गीतकार गोपालदास नीरज का 93 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांस ली। उनका पूरा नाम गोपालदास सक्सेना ’नीरज’ था। नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में हुआ था। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता गुजर गये। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लम्बी बेकारी के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। उन्होंने मेरठ कॉलेज में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। कवि सम्मेलनों में लोकप्रियता के चलते नीरज को मुंबई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में काम करने का मौका मिला।

 

कानपुर में पढ़े और राजनीति में भी उतरे

महाकवि गोपाल दास नीरज पूरी तरह सियासत से भी अछूते न रह सके। कलम चलाने के साथ आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे नीरज ने कानपुर से राजनीति में भी हाथ आजमाया था। गीतकार गोपाल दास नीरज जब डीएवी कॉलेज में क्लर्क की नौकरी कर रहे थे, तभी उनकी अच्छी मंडली कानपुर में बन चुकी थी। उन्होंने कानपुर में युवाओं की टोलियों को बनाया और होली के बाद गंगा मेला के दौरान रंग-गुलाल के साथ निकल पड़ा करते थे। 1967 में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले एक बार नीरज अपने नवाबगंज निवासी कवि मित्र विवेक श्रीवास्तव से मिलने गए। वहां से कुछ मित्रों के साथ घूमने के लिए बिठूर चले गए। वहां राजनीतिक चर्चा हुई तो दोस्तों ने ही नीरज से कहा कि आपको राजनीति में आना चाहिए। पहले नीरज ने मना किया लेकिन फिर मान गए।

 

कांग्रेस ने नहीं दिया टिकट

विवेक श्रीवास्तव के पौत्र राहुल बताते हैं कि की उस वक्त कवि गोपालदास नीरज जी ने एक शर्त रख दी कि चुनाव लड़ेंगे अपने अंदाज में। कवि ने लोकसभा चुनाव 1967 का चुनाव लडऩे के रजामंदी दे दी। कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने का वादा किया। वह तैयारी में जुट गए, लेकिन ऐन वक्त पर कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो वह उन्होंने निर्दलीय पर्चा भर दिया। राहल बताते हैं कि कवि की जमानत जब्त हो गई, लेकिन 20 हजार वोट पाकर वो बहुत खुश हुए थे। नीरज की जीवनी से जुड़ी किताबों में जिक्र है कि वह सभाओं में गीत और भाषण के इस्तेमाल से सभी को रिझाते थे। साथ ही यह भी हुंकार भरते थे कि भ्रष्ट और अपराधी मुझे वोट न दें। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनीं कि पर्याप्त लोकप्रियता के बावजूद वह चुनाव हार गए थे।

 

चुनाव हारने के बाद बने महाकवि

कानपुर की पाती में लिखी गोपाल दास नीरज की इन पंक्तियों में दर्द के सिवाय कुछ नहीं है। उनके बेहद करीबी रहे विपुल जी निवासी आजादनगर कहते हैं कि चुनाव हारने के बाद उन्हें दर्द मिला और यही उनके लिए दवा बन गई। उन्होंने रूबाई को अपनाया जिसके चलते उनके गीतों की काव्य शैली अन्य कवियों से अलग थी। उन्हे गीतों का कुंवर कहा जाता था। विपुल बताते हैं कि उन्हें तुअर की दाल और मट्ठे के आलू और बासी पूड़ी बहुत पसंद थी। वह जब भी घर पहुंचते थे, रात में ही पूड़ी बनाकर रख दी जाती थी। उनकी फरमाइश पर घर में खाना बनता था। आजाद नगर स्थित 2008 में पुस्तक मेले का आयोजन किया गया था। इसमें उन्हें ही अकेले काव्य पाठ करना था। नीरज जी ने तीन घंटे लगातार काव्य पाठ किया।

 

...तो अखिलेश को दी थी नसीहत

अब उजालों को यहां वनवास ही लेना पड़ेगा, सूर्य के बेटे अंधेरों का समर्थन कर रहे हैं। पद के लालच में देश के लुटेरों का समर्थन नेता करने से गुरेज नहीं कर रहे‘। कुछ इन्हीं पंक्तियों के साथ डीएवी कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने शहर आए पदभूषण सम्मानित कवि गोपालदास नीरज ने राजनेताओं द्वारा अमर्यादित बयानबाजी से दुखी होकर अगस्त 2016 में इस कविता के जरिए अपना संदेश नेताओं तक पहुंचाया था। कवि ने कहा था कि यूपी में जिस तरह से अपराध का ग्राफ बढ़ा है, इससे वह काफी दुखी हैं। अखिलेश सरकार को जल्द ही इस पर लगाम कसनी होगी। कवि नीरज ने दो साल के मोदी सरकार के काम-काज की सराहना करते हुए कहा था कि कि मोदी जी की विदेश नीति के चलते भारत का मान बढ़ा है। मोदी सरकार से मांग करते हुए कहा कि साहित्य के क्षेत्र में उन्हें कुछ करना चाहिए, जिससे कि देश को अच्छे कवि मिल सकें।

Vinod Nigam
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