नन्हीं गुड़िया को भूख से तड़पता देख फांसी के फंदे पर गया ‘मजदूर’

काकादेव थानाक्षेत्र का मामला, लाॅकडाउन के चलते रोजगार छिनने से हो गया था बेरोजगार, बच्चों कों भूख से बिलखता देख उठा लिया खाफनाक कदम।

By: Vinod Nigam

Published: 16 May 2020, 08:10 AM IST

कानपुर। लाॅकडाउन के प्रहार से जहां किसान हलकान है तो वहीं हाईवे पर मजदूरों की पैदल यात्रा जारी है। इनसब के बीच कानपुर में एक झंकझोर देने वाला मामले सामने आया है। यहां पर दिहाड़ी मजदूर ने अपनी नन्हीं बेटी को भूख से तड़पता देख फांसी लगाकर जान दे दी। स्थानीय लोगों की सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है।

मजदूरी कर पालता था पेट
काकादेव थानाक्षेत्र स्थित राजा पुरवा बस्ती में बाहरी शहरों के मजूदर रहते हैं। जिसमें से कुछ फैक्ट्रियों में तो कुछ दिहाड़ी में काम करते हैं। इन्हीं में बिजय बहादुर (40) अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ रहता था। कोरोना वायरस के कारण देश में 17 मई तक लाॅकडाउन के ऐलान के बाद बिजय बेरोजगार हो गया। घर में जो पैसा था उसी से अपने परिवार को दो वक्त की रोटी खिलाता था। लेकिन घर में रखे पैसे खत्म हो गए और किचन में रोटी का आटा खत्म हो गया तो विजय टूट गया। बच्चे भूख से बिलखने लगे। नौनिहालों की भूख विजय बर्दाश्त नहीं कर सका और फांसी के फंदे पर झूलकर इस दुनिया से चला गया।

खुर्दार था विजय
पड़ोसी राजीव के मुताबिक विजय बहादुर के साथ ही उसके बच्चों की हमसभी ने मदद की और उसका हौसला बनाए रखा। लेकिन बुधवार के दिन से उसने भोजन लेने से इंकार कर दिया। कहते हैं, विजय ने हाथ जोड़कर कहा कि भईया हम मजदूर हैं और खून पसीने की कमाई के जरिए परिवार को पेट पालेंगे। वह खुदार था और इसी के कारण उसने हमसब से सहयोग लेना बंद कर दिया। वह मजदूरी के लिए गया पर रोजगार नहीं मिला। इसी के कारण उसने जान दे दी।

नहीं बिका मंगलसूत्र
मृतक की पत्नी ने बताया कि शादी का मंगलसूत्र और चांदी की तोड़ियां मेरे पास रखी थी। मैं उन्हें बेचने के लिए कईबार बाजार गई, लेकिन दुकान बंद होने के कारण खरीदार नहीं मिल सके। मृतक की पत्नी ने बताया कि मुझे जेवरल की दुकान खुलने की जानकारी हुई। मैं बच्चों को पति के पास छोड़कर चली गई। घर वापस आई तो पति का शव फांसी के फंदे पर लटक रहा था। मृतक की पत्नी ने बताया कि हमारे तीन बेटे और एक बेटी है। पति नन्नीं गुडिया को बहुत प्यार करते थे। घर में राशन नहीं होने के कारण गुड़िया रो रही थी। वह 1 दिन से भूखीं थी। पति ने बेटी की भूख के चलते खौंफनाक कदम उठा लिया।

नहीं पहुंचे जनप्रतिनिधि
मजदूर की मौत के बाद एक भी जनप्रतिनिधि नहीं पहुंचा। पोस्टमार्टम के बाद स्थानीय लोगों ने चंदा कर मजदूर के शव का अंतिम संस्कार किया। राजीव कहते हैं कि 24 मार्च से देश में लाॅकडाउन लगा। तब से हमारे देश के जनप्रतिनिधियों की तस्वीरे अखबारों में गरीबों को भोजन कराते हुए खूब छप रही हैं। पर जमीनी हकीकत इसके विपरीत है। यदि भाजपा, सपा, कांग्रेस व बसपा के नेता इस मजदूर की मदद कर देते तो शायद खुर्दार विजय आज जिंदा होता।

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