फूलनबाई के कारण फिर पूरी रात नहीं सोई ‘बेहमई’


14 फरवरी 1981 को फूलन देवी ने बेहमई में बहाया था 20 लोगों का लहू, 38 साल चले मुकमदे का 6 जनपरी को आएगा फैसला, ग्रामीणों को अभी इंसाफ की आस।

By: Vinod Nigam

Published: 06 Jan 2020, 09:37 AM IST

कानपुर। यमुना के किनारे बसा बेहमई गांव एकबार फिर 5 जनवरी को पूरी रात जगा। भोर पहर से ग्रामीण शहीद स्मारक के पास बैठे थे और 14 फरवरी 1981 की वारदात को याद कर फूट-फूट कर रो रहे थे। युवा भी देश के इतिहास के सबसे नरसंहार के बाद सरकार, न्यायपालिका को कोसने के साथ 6 जनवरी को आने वाले 39 साल पुराने मुकदमे के फैसले में बीहड़ की खुंखार डकैत फूलनदेवी को सजा की उम्मीद बांधे हुए थे। विट्टन देवी पूजा पाठ के बाद स्कूल के बाहर बैठकर यही कह रही थीं की फुलवा तो नहीं रही पर हम चाहते हैं कि कोर्ट उसे दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाए।

क्या है पूरा मामला
39 साल पहले बीहड़ की खुंखर डकैत फूलन देवी सिर पर लाल दुपट्टा, माथे पर काला किलक, कंधे पर रायफल और हाथ में भोंपू और अपने 30 से ज्यादा हथियारबंद डकैतों के साथ बेहमई में दखिल हुई। फूलन ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी, जिससे जो जहां था वह वहीं छिप गया। फूलन ने दहाड़ लगाते हुए कहा था कि मुझे लालाराम-श्रीराम को सौंप दो। ऐसा नहीं किया तो गांव में मर्द जाति का खात्मा कर दूंगी और किया भी वही। फूलन देवी ने 30 ग्रामीणों को उनके घरों से बाहर लाई और एक मिट्टी के टीले पर खड़ा कर सभी को गोलियों से फून दिया। फूलन की गोली से 20 की मौके पर मौत हो गई थी और 6 ग्रामीण घायल जबकि तीन किसी तरह से जान बचाने में कामयाब रहे थे।

कौन थी फूलन
फूलन देवी मूलरूप्स जालौन जिले के रहने वाली थी। फूलन के पिता की 40 बीघा जमीन पर चाचा ने कब्जा किया था। 11 साल की उम्र में फूलन ने चाचा से जमीन मांगी। इस पर चाचा ने फूलन पर डकैती का केस दर्ज करा दिया। फूलन को जेल हुई। वह जेल से छूटी तो डकैतों के संपर्क में आई। दूसरी गैंग के लोगों ने फूलन का गैंगरेप किया। इसका बदला लेने के लिए फूलन ने बेहमई के 20 लोगों को गोलियों से भून दिया था। इसी घटना के बाद फूलन देवी बैंडिट क्वीन कहलाने लगी।

नहीं बदली बेहमई
पत्रिका टीम बेहमई गांव पहुंची जहां फूलन के दिए जख्म जस के तस आज भी मौजूद हैं जिसे टीले पर 20 लोगों को खड़ा का फूलन गोली मारी थी और सभी के शव जमीन पर पड़े, वहां शहीद स्मारक ग्रामीणों ने चंदे से बनवाया है। हरदिन शाम को मृतकों के नाम से अगरपत्ती जलाई जाती है और हरवर्ष 14 फरवरी को शहीद दिवस बनाया जाता है। बेहमई कांड के इकलौते वादी ठाकुर राजाराम ही जीवित बचे हैं और पिछले 38 सालों से वह हत्याकांड का केस लड़ रहे हैं। सोमवार को फैसला आना था, इसी के कारण राजराम के चेहरे में कुछ हद तक सुकून था और वह कानपुर देहात की डकैती कोर्ट जाने के लिए तैयारी कर रहे थे।

38 साल से लड़ रहे मुकदमा
राजाराम ने बताया कि मुकदमे में आधे से ज्यादा आरोपी फरार हैं। फूलन को सांसद बनाया गया। क्या यह सब शासन और प्रशासन नहीं देख रहा था? अब 6 जनवरी को देखेंगे कि हमें क्या न्याय मिला? एक डकैत मान सिंह का तो मुकदमे में नाम ही नहीं डाला गया। ठाकुर राजा राम ने बताया कि फूलन ने उनके 25 साल के बेटे बनवारी सिंह को भी मौत के घाट उतारा था। ओमकार सिंह कहते हैं कि उस समय मेरी उम्र लगभग 15 साल की थी। 9वीं में पढ़ता था। जब मुझे भनक लगी तो मैं भाग खड़ा हुआ। जब लौटा तो हाहाकार मचा हुआ था। हर घर में एक लाश थी। एक परिवार में तो कोई दीपक जलाने वाला भी नहीं बचा था।

सीने में मारी गोली पर बच गए थे जेंटर
बेहमई निवासी जेंटर अपने घाव दिखाते हुए कहते हैं कि जब फूलन का गैंग गोलियां बरसा रहा था, तब हम लोग बीच में थे और जमीन पर गिरकर झूठमूठ मरने का बहाना कर रहे थे। गोलीबारी के बाद डकैतों ने एक-एक को चेक किया और गोलियां मारी थी। मुझे भी सीने पर रखकर गोली दागी थी, जो पीछे से चीरती हुई निकल गई थी। तकरीबन 3 साल तक कानपुर से लखनऊ तक इलाज चला। किस्मत थी, जो बच गया। काफी समय तक उस कांड को यादकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। अब डर नहीं लगता। जेंटर कहते हैं कि केस की हर सुनवाई पर मैं कोर्ट गया हूं। अब इतनी देर हो गई है कि इस फैसले का बहुत असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि ज्यादातर आरोपी मर चुके हैं। जो बचे हैं, वे भी मरने की कगार पर हैं।

इस वजह ये हत्याकांड को दिया अंजाम
बेहमई से तकरीबन 7 किमी दूर ही फूलन की जिंदगी के दो अहम किरदार श्रीराम और लालाराम का गांव दमनपुर है। हालांकि, दोनों भाइयों की मौत काफी पहले हो चुकी है, लेकिन कभी उनके साथ रह चुके उनके छोटे भाई मन्ना सिंह आज भी परिवार के साथ दमनपुर में रहते हैं। मन्ना बताते हैं कि लालाराम और श्रीराम ने फूलन के करीबी विक्रम मल्लाह को मार दिया। इसके बाद फूलन के साथ कुछ लोगों ने दुष्कर्म किया। फूलन इस कांड का दोषी श्रीराम और लालाराम को मानती थी और उन्हें मारने का प्रण किया था। दोनों भाई बीहड़ से भाग गए। पर फूलन को झूठी खबर दी गई कि लालाराम और श्रीराम बेहमई में रूके हैं और इसी वजह से उसने 20 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

श्रीराम-लालाराम भी मारे गए
मन्ना बताते हैं कि बेहमई हत्याकांड के बाद मैं भी अपना परिवार लेकर पंजाब चला गया। उसके बाद हम लोग 2003 में गांव में लौटे। उससे पहले श्रीराम की बेहमई कांड में पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई थी, जबकि लालाराम की 17 मई 2000 को हत्या हो गई। हमारा जो पुश्तैनी घर था, सरकार ने उसकी कुर्की करवा दी थी। मन्ना ने बताया कि श्रीराम-लालाराम भी डकैत थे, लेकिन फूलन के चलते उन्हें बीहड़ से भागना पड़ा। फूलन ने बेहमई में हत्याकांड के बाद हमारे गांव की सरहद पर भी आई थी, लेकिन पुलिस के आने की जानकारी पर वह यमुना को पार कर फरार हो गई।

Vinod Nigam
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