देश के राष्ट्रपति किले पर तिरंगा फहराते रहे, वहीं उनके क्षेत्र में शहीदों के परिवार आंसू बहाते रहे

Abhishek Gupta

Publish: Jan, 26 2018 08:51:33 PM (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India

कानपुर देहात. शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का यहीं नामों निशां होगा, ये पंक्तियां अक्सर लोगों की जुबां से सुना जाता है। जहां एक ओर आज के दिन पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा है। वहीं दूसरी ओर कानपुर देहात में एक ऐसा ही गांव सबलपुर है, जहाँ शहीदों का स्मारक अपनी बदहाली को लेकर आंसू बहां रहा हैं। देश को आजाद कराने के लिए 1857 में यहां 13 देशभक्तों ने अग्रेजों से जमकर मुकाबला किया था और बाद में देश की आजादी के लिए लड़ते हुए इन लोगों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। जिस जगह पर अंग्रेजों द्वारा देशभक्तों को फांसी दी गई थी, उसी स्थान पर आजादी कई वर्षों के बाद वर्ष 2003 में शहीदों की याद में स्मारक बनवा दिया गया था, लेकिन आज वो शहीद स्मारक महज पत्थर का शिलालेख बनकर रह गया है। यहीं नहीं देश की आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिवारों और उनके गांव के हाल भी बद से बदत्तर हो गये हैं। न कोई सरकारी सहायता मिली है और न ही गांव में विकास हुआ है। आज भी सरकारी सहायता और विकास की आस लगाये बैठा शहीदों का परिवार और उनका गांव सरकार और प्रशासन की ओर निहार रहा है।

शहीदों की याद में बना शहीद स्मारक, अंग्रेजों के आतंक को बयां करता शहीद पार्क, देशभक्ति की अलख जगाता शहीद स्मारक, बदहाल शहीद पार्क देखरेख के अभाव में जर्जर हो चुका है। जनपद कानपुर देहात के डेरापुर तहसील क्षेत्र के सबलपुर गांव का कुछ ऐसा ही हाल है। जहां इन 13 देशभक्तों ने 1857 में देश की आजादी के लिए लड़ते हुए अग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे और बाद में अंग्रेजों के जुल्म का शिकार हुए थे। अग्रेजों ने गांव के अन्दर खड़े नीम के पेड़ पर इन 13 देश भक्तों को फांसी पे लटका दिया था। आजादी के कई वर्षों बाद वर्ष 2003 में इस गांव में इन शहीद देशभक्तों की शहादत की याद में स्मारक बनवा कर राष्ट्रीय पर्वों पर यहां राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर इन देश भक्तों को याद किया जाने लगा। कुछ समय तो अधिकारी और राजनेता राष्ट्रीय पर्व के समय ध्वजारोहण के लिए इस गांव में आते रहे और उस स्मारक की साफ-सफाई पर ध्यान देते रहे, लेकिन कुछ ही वर्षों बाद ही अधिकारीगण इस शहीद पार्क और उनके गांव को भूल गये।

न कोई राजनेता वहां पहुचा और न ही प्रशासनिक अधिकारियो ने कोई दस्तक दी। हालांकि जिन्होंने अपने पूत और सपूत खोये ऐसे शहीदों के परिवार और गांव के ग्रामीण ही इस पार्क में राष्ट्रीय ध्वज को फहरा कर इन शहीदों को याद कर लेते हैं। इतना ही नहीं जहां पार्क में चारों ओर गंदगी ही गंदगी देखने को मिल रही हैं। वहीं शहीदों के परिवार और उनके इस गांव के हाल भी बेहाल हैं न तो शहीदों को परिवारों को कोई सरकारी योजनाओं को लाभ मिल पा रहा हैं और न ही गांव में विकास हो पा रहा हैं। आजादी के कई वर्षो बाद भी शहीदों के इस गांव में बिजली, पानी, सड़क के साथ अन्य सरकारी योजनाओं का अभाव देखने को मिल रहा हैं।

उनके पास सड़क तो है लेकिन जर्जर, आवास तो है लेकिन कच्चे, गलियां तो है लेकिन टूटी, नालियां तो है लेकिन गंदगी से पटी हुई, बिजली के खम्भे तो है लेकिन तार नहीं, सरकार की कई योजनाएं तो है लेकिन शहीदों के परिवार और उनके इस गांव के लिए सिर्फ आश्वासन है। जिसका खामियाजा शहीदों का परिवार और उनका गांव भुगत रहा हैं। जिसके चलते देश को आजाद कराने के लिए अपनी जान गंवाने वाले देश के लालों के परिवारों का हाल बद से बदत्तर हो गये है। शहीदों का परिवार सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलने के चलते आर्थिक तंगी से जूझ रहा हैं। इतना ही नहीं सरकार और प्रशासन की उपेक्षा के चलते शहीदों के ये परिवार मांनसिक रूप से परेशान भी हो चुके हैं। शहीदों के परिजनों की माने तो सरकार और प्रशासन गांव को शहीदी गांव घोषित कराकर विकास कार्यो को युद्व स्तर पर कराये, ताकि देश के इन लालों का सच्ची श्रृद्वाजंलि दी जा सके।

वहीं गांव के ग्रामीण जहां एक ओर इन 13 देश भक्तों को याद कर गर्व महसूस कर रहे है। वहीं दूसरी ओर सरकार और प्रशासन की कार्यशैली से दुखी भी दिख रहे हैं। शहीद पार्क बनने के बाद राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के विकास कराने के वादों से परेशान दिख रहे हैं। ग्रामीणों की माने तो जब शहीदो की याद में इस पार्क का निर्माण कराया गया और अधिकारियों द्वारा किये गये विकास के दावो से गांव की दशा बदलने की आशा जगी थी लेकिन न तो गांव में विकास हुआ और न ही राजनेता और अधिकारियों द्वारा इस ओर ध्यान जा रहा हैं।

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