नीम की खेती से मालामाल होंगे कोरोना से तबाह हुए किसान

मिलिया डुबिया किस्म की पैदावार के लिए मदद भी मिलेगी

कानपुर। अब नीम के जरिए एक साथ दो समस्याओं का हल निकाला जाएगा। यह समस्या है किसानों की आर्थिक तंगी और पर्यावरण प्रदूषण। प्रदेश में कम हो रहे जंगलों के कारण बढ़ते प्रदूषण और खेती में हो रहे नुकसान के कारण कंगाल होते किसानों की समस्या से छुटकारा पाने के लिए नया उपाय खोजा गया है। जिसके तहत अब किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए अब मिलिया डुबिया (नीम की वैराइटी) की पैदावार की जाएगी। इससे नीम के पेड़ बढ़ेंगे, जिससे पर्यावरण को भी लाभ होगा।

मिलिया डुबिया नीम के लाभ
नीम तो औषधीय गुणों से भरपूर होता है, इसलिए आम जीवन में इसका खूब प्रयोग होता है। इसकी पत्तियों से लेकर इसके बीज तक सब कुछ अत्यंत उपयोगी होते हैं। त्वचा, पेट, आँखें और विषाणु जनित समस्याओं में इसका प्रयोग अद्भुत होता है। इसकी पत्तियाँ किसी भी प्रकार के संक्रमण को रोक सकती हैं। लेकिन मिलिया डुबिया वैराइटी का नीम और भी कई काम आता है।

किसानों की बढ़ेगी आमदनी
मिलिया डुबिया का पेड़ पांच से छह साल में तैयार हो जाता है। इसका उपयोग प्लाईवुड और पैकिंग में काफी होता है। इसकी काफी मांग भी है। एक पेड़ करीब चार से पांच हजार रुपए में बिकता है। इससे किसानों को मुनाफा भी होगा। मिलिया डुबिया की खेती के बीच में कई अन्य फसल भी पैदा कर सकते हैं। यूपी के मौसम को देखकर काफी विकसित हो जाएगा। इसलिए यूपी में पैदावार होने से काफी फायदे मिलेंगे।

वैराइटी को लेकर शोध होगा
नीम की इस वैराइटी को लेकर वन अनुसंधान केंद्र और सेंट्रल एग्रो फॉरेस्ट्री रिसर्च इंस्टीट्यूट झांसी मिलकर करेंगे। इसका पूरा प्रोजेक्ट तैयार करके डिपार्टमेंट ऑफ बायो टेक्नोलॉजी को भेज दिया गया है। अभी तक मिलिया डुबिया को लेकर यूपी में कोई भी शोध नहीं हुआ है। दोनों केंद्र मिलकर मिलिया डुबिया की वैराइटी पर शोध करेंगे। किस क्षेत्र के लिए कौन सी वैराइटी बेहतर होगी इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे। वन रिसर्च अनुसंधान के निदेशक डॉ. कुरूविला थॉमस ने बताया कि प्रोजेक्ट तैयार करके भेजा है। स्वीकृति मिलते ही दोनों संस्स्थान एक साथ काम करेंगे।

पैदावार से बढ़ेगा जंगल
मिलिया डुबिया की पैदावार भारत के साउथ क्षेत्रों में काफी है। इसकी ग्रोथ काफी है। चौड़ी पत्ती वाली नीम होती है। इसकी पैदावार 40 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष होती है। जबकि सामान्य जंगल में 0.5 क्यूबिक मीटर प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष की पैदावार है। इससे यूपी में खत्म होते जंगह को भी बढ़ावा मिलेगा। एग्रो फॉरेस्ट्री योजना के अंतर्गत पंजाब और हरियाणा ने इसकी पैदावार की है। उनको काफी फायदा हुआ है।

आलोक पाण्डेय
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