क्षत्रपों की कमजोरी का कांग्रेस उठाएगी फाएदा, यूपी में एकला चलो की राह पर सरपट दौड़ेगा पंजा

दलित सुरक्षा सम्मेलन के जरिए बना रही पैठ, मुस्लिमों तक पहुंचा रही कांग्रेस अपनी बात

By: Vinod Nigam

Published: 13 Mar 2018, 05:50 PM IST

कानपुर। पिछले तीन दशक से यूपी की सियासत में अहम रोल अदा करने वाले क्षत्रपों की हालत चार से कमजोर पड़ी है। इसी के चलते अब राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ने नए सिरे से जमीन पर काम करना शुरू कर दिया है। भाजपा को टक्कर देने के लिए कांग्रेस के पदाधिकारी अंदरखाने 2019 का मिला फतह करने के लिए जुट गए हैं। इसी के तहत अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ द्वारा प्रदेश के सभी मंडलों में ‘दलित सुरक्षा संविधान बचाओ’ के तहत सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं। बांदा सम्मेलन के आगाज के बाद मंगलवार को उरई के टाउन हाल में दिग्गज कांग्रेसी एकत्र हुए। अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष संतराम नीलांचल ने इस मौके पर कानपुर के साथ ही अन्य जिलों से आए कांग्रेसियों को अगले लोकसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरने का फरमान सुना दिया। कांग्रेस पूरी रणनीति के साथ अपने आपको भाजपा के मुकाबले के लिए तैयार कर रही है और अपने पुराने वोटबैंक दलित और मुस्लिमों को लाने के लिए नेताओं को लगाया है।
निकाय में सपा, बसपा से आगे रही कांग्रेस
लोकसभा के बाद विधानसभा में सपा, बसपा सहित अन्य क्षेत्रीय दलों की करारी हार हुई। कांग्रेस भी 2012 के मुकाबले बहुत कम सीटों पर सिमट गई थी। इसी के बाद से पुराने कांग्रेस के नेताओं ने हार का ठीकरा गठबंधन पर फोड़ा था। जब प्रशान्त कुमार सपा के साथ गठबंधन की बात करने के लिए कानपुर आए थे तो कई कांग्रेसियों के साथ उनकी बहस हुई थी। नौबत हाथा-पाई तक पहुंच गई, तो पीके तत्काल कानपुर से लखनऊ के लिए निकल गए। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बातों को नजरअंदाज कर यूपी में राहुल गांधी ओर अखिलेश यादव ने गठबंधन किया, लेकिन दोनों लड़कों की दोसती यहां की जनता को पसंद नहीं आई। 2017 के चुनाव के बाद कांग्रेस यूपी की सियासत में अकेले चलने के लिए अपने कदम आगे बढ़ा दिए, जिसका नतीजा निकाय चुनाव में देखने को मिला। कानपुर नगर निकाय में मेयर पद की उम्मीदवार वंदना मिश्रा ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी। साथ ही भाजपा के बाद सबसे ज्यादा पार्षद कांग्रेस के जीतकर सदन पहुंचे।
गठबंधन को कमजोर बता, ठोकेंते ताल
लोकसभा चुनाव 2019 में लगभग-लगभग सपा और बसपा के बीच गठबंधन पक्का हो गया है। इसी के चलते कांग्रेस सूबे में अपने को पीछे नहीं रहने देना चाहती। पार्टी हाईकमान के आदेश पर कांग्रेस के दिग्गज व दलित नेता पीएल पुनिया 18 फरवरी को कानपुर आए थे। यहां उन्होंने कांग्रेस के पुराने नेताओं के साथ दलित समाज के लोगों से मुलाकात की थी। पुनिया ने कार्यकर्ताओं से कहा था कि पूरे साल दलित सुरक्षा संविधान बचाओ का आयोजन करने को कहा था। इसी के बाद से कांग्रेसी दलितों की बस्तियों में जाकर उनकी समस्याएं सुनते हैं और पार्टी की विचारधारा से उन्हें अवगत कराते हैं। कांग्रेस पदाधिकारियों से कहा गया है कि वह दलितों के बीच जाकर उनका नाम व मोबाइल नंबर लें और विधानसभा, वार्ड, बूथ लेबल पर इसी समाज के युवा को जिम्मेदारी सौंपे।
ददुआ के चलते क्षत्रपों ने किया राज
प्रदेश में सबसे ज्यादा संख्या दलितों की बुंदेलखंड में है और 1989 से पहले यह इलाका कांग्रेसियों का गढ़ हुआ करता था। यहां राममंदिर के आंदोलन के वक्त भी भाजपा कमजोर रही। लेकिन 2002 में सपा और बसपा ने इस इलाके में पैर जमा लिए। पाठा का डकैत ददुआ का बुंदेलखंड के साल जिलों में आतंक था और बंदूक के बल पर वोट पड़ते थे। ददुआ 2002 से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती की पार्टी के साथ जुड़ा रहा और जिसके चलते यहां हाथी खूब दौड़ा। लेकिन 2003 में मुलायम सिंह यादव के सत्ता संभालते ही ददुआ पूरे परिवार को सपा के अंदर प्रवेश करा दिया। 2007 के चुनाव में प्रदेश में बसपा की सरकार बनी, लेकिन ददुआ के चलते यहां हाथी की हार हुई। मायावती ने ददुआ का खेल खत्म कर फिर से पैर पसारने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। 2012 में साइकिल दौड़ी तो 2017 में कमल खिला। पर यहां 1989 के बाद कांग्रेस का उदय नहीं हुआ। इसी के चलते पार्टी अब पूरा फोकस दलित वोटर्स पर लगाए हुए है और सम्मेलन के जरिए उन्हें अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही है।
मुस्लिमों को साधेंगे सिद्दकी
बुंदेलखंड और कानपुर क्षेत्र के 17 जिलों की 52 विधानसभाओं में से 47 पर भाजपा का कब्जा है। बसपा का साथ छोड़कर कांग्रेस में आए नसीमुद्दीन सिद्दकी का यहां पर काफी रूतबा है। कानपुर के कई मुस्लिम नेता बसपा का साथ छोड़ चुके हैं और कई छोड़ने की तैयारी में है। सभी कांग्रेस के साथ खड़े हैं। जानकारों का मानना है कि सिद्दकी के आने से कानपुर में भाजपा को कांग्रेस कड़ी टक्कर मिल सकती हे। क्योंकि ब्राम्हण के बाद सबसे ज्यादा वोटर्स की संख्या मुस्लिमों की है और पिछले कई चुनावों में यह वोटर्स सपा, बसपा और कांग्रेस में बटता रहा है। बसपा और सपा के पास वर्तमान में मुस्लिम समाज का जमीनी नेता नहीं होने से उन्हें इसका नुकसान उठाने के साथ कांग्रेस का फाएदा हो सकता है। कांग्रेस से जुड़े एक पदाधिकारी ने बताया कि सिद्दी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, हां वह अपने बेटे को फतेहपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव के मैदान में उतारेंगे।

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