पूर्वांचल के साथ-साथ अवध और बुंदेलखंड में पैर जमाएंगे ओमप्रकाश राजभर

पूर्वांचल के साथ-साथ अवध और बुंदेलखंड में पैर जमाएंगे ओमप्रकाश राजभर

Alok Pandey | Publish: Sep, 11 2018 11:42:52 AM (IST) Kanpur, Uttar Pradesh, India

राजभर के नए सियासी कदम को यूपी की नई सियासी तिकड़म कहें या भाजपा की सोची-समझी रणनीति, ताकि विपक्ष के वोटों का बड़े पैमाने पर बिखराव करना संभव हो।

कानपुर. भाजपा सरकार के सहयोगी और सिरदर्द ओमप्रकाश राजभर अब अपना सियासी कैनवॉस बड़ा करना चाहते हैं। पूर्वांचल की वाराणसी बेल्ट से निकलकर राजभर अपनी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) को उत्तर प्रदेश में अवध और बुंदेलखंड इलाके में मजबूत करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसी तारतम्य में बीते दिवस कानपुर में पार्टी का कार्यकर्ता सम्मलेन आयोजित किया गया। यशोदानगर इलाके में पार्टी का यह सम्मेलन भले ही छोटा था, लेकिन निहितार्थ बहुत हैं। इस सम्मेलन में कानपुर के साथ-साथ इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, बांदा, चित्रकूट समेत कई अन्य जिलों से कार्यकर्ताओं के छोटे-बड़े जत्थे पीले झंडे लहराते हुए आए थे। बैठक में मुख्य जोर तो अगले महीने के अंत में यानी 27 अक्तूबर को द्वारा पार्टी के स्थापना दिवस पर लखनऊ में प्रस्तावित बड़ी रैली को कामयाब बनाने पर चर्चा हुई, लेकिन वक्ताओं ने प्रदेश और केंद्र सरकार की नीतियों पर जोरदार जुबानी हमला भी बोला। एससी-एसटी एक्ट से लेकर मंहगाई और पेट्रोल-डीजल के बेकाबू मूल्य के बहाने यह संदेश दिया गया कि मुमकिन है कि अगले चुनाव में पार्टी नया रास्ता अख्तियार करेगी। कार्यकर्ताओं को समझाया गया कि अब बैखासी नहीं मिलेगी, अपने दम पर हैसियत दिखाने का वक्त है।


सरकार पर दबाव या नया गुल खिलाएंगे राजभर

राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) जल्द ही कई अन्य जिलों में इसी प्रकार कार्यकर्ता सम्मेलन करेगी। मूल मकसद है कि पूर्वांचल के साथ-साथ अब अवध यानी लखनऊ-कानपुर के आसपास का इलाका और बुंदेलखंड में अपनी सियासी पहचान को पुख्ता करना। इसी के साथ कैबिनेट मंत्री और पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने पिछड़ों के आरक्षण के बंटवारा व शराब बंदी समेत अन्य मुद्दों पर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाई है। चर्चा है कि 27 अक्टूबर की रैली में राजभर भाजपा के साथ अपने संबंध बनाए रखने को लेकर भी कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं। इस बारे में ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि रैली में वह अपने समर्थकों के बीच खुलकर उन मुद्दों पर चर्चा करेंगे, जिन मुद्दों को लेकर उनका और भाजपा का सियासी संबंध बना था। मसलन पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण में पिछड़ी, अति पिछड़ी और सर्वाधिक पिछड़ी जाति के लिए बंटवारा करने का मुद्दा सबसे प्रमुख होगा। गौरतलब है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव के छह महीने पहले इस मांग को पूरा करने का वादा किया था, इसी नजरिए से मियाद पूरी होने पर राजभर दबाव बनाने की रणनीति में जुट गए हैं। राजनीतिक के जानकारों का कहना है कि प्रदेश में महागठबंधन की स्थिति में भाजपा को नुकसान की आशंका के मद्देनजर ओमप्रकाश राजभर अपना नया सियासी कुनबा तैयार करने की फिराक में हैं। उनके संभावित सहयोगियों में शिवपाल सिंह यादव, निषाद पार्टी, अमर सिंह, बाबू सिंह कुशवाहा जैसे नेता-पार्टियां हैं।


राजभर का अलगाव भाजपा के लिए संजीवनी होगा!

प्रदेश के कुछ राजनीतिक पंडितों का कहना है कि राजभर का हल्ला दिखावा है। दरअसल, यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। ओमप्रकाश राजभर अक्टूबर में अलगाव की कोई घोषणा नहीं करेंगे। सच तो यह है कि वह जनवरी तक ऐसे ही भाजपा विरोध में हल्ला मचाते रहेंगे। यूपी में महागठबंधन बना तो राजभर चुनाव से पहले भाजपा से अलग होकर नया गठबंधन बनाएंगे। इस गठबंधन में पूर्वांचल की कमान ओमप्रकाश संभालेंगे, जबकि अवध में शिवपाल सिंह यादव। बुंदेलखंड के लिए एक ताकतवर नेता की खोज जारी है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक पाण्डेय कहते हैं कि यदि ऐसा हुआ तो यह नया गठबंधन सिर्फ भाजपा विरोध के मतों के बिखराव के लिए होगा। जाहिर है कि राजभर का संभावित गठबंधन यूपी की तमाम लोकसभा सीटों पर भाजपा के लिए संजीवनी का काम करेगा।

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