यहां प्रथम पिंडदान के लिये उमड़ता है सैलाब, वहां आज इन हालातों से कुंठित हो रहे लोग

यहां प्रथम पिंडदान के लिये उमड़ता है सैलाब, वहां आज इन हालातों से कुंठित हो रहे लोग 

By: Ruchi Sharma

Updated: 11 Sep 2017, 12:52 PM IST

अरविन्द वर्मा

कानपुर देहात. मनुष्य की देहांत हो जाने के बाद पितरों के लिए श्रृद्धापूर्वक किये जाने वाले कार्य श्राद्ध कहलाता हैं। विधि-विधान से श्राद्ध को ही पितरों का यज्ञ कहते हैं। मनुष्य मात्र के लिए शास्त्रों में तीन कर्जे विशेष बताये गये हैं। इनमें से श्राद्ध की क्रिया से पितरों का कर्ज उतारा जाता हैं। जिसका उल्लेख विष्णु पुराण में भी हैं। इसी के चलते पितृ पक्ष के माह में अपने पितरों को पिण्डदान देने का कार्य बड़ी तादात में लोग करते हैं। इसके लिये लोग दूर दराज के विख्यात स्थानों पर जाकर पिंडदान कर श्राद्ध की क्रिया पूर्ण करते है।

 

ऐसा ही कानपुर देहात के मूसानगर स्थित देवयानी सरोवर जो छोटी गया के नाम से भी
जाना जाता हैं। यहां भी पितृ पक्ष में महीने में पिण्डदान करने आये श्रृद्धालुओं को खासी भीड़ देखने को मिलती हैं। लोगों का मानना हैं कि देवयानी सरोवर में पिण्डदान किए बिना गयाजी में पिण्डदान करना व्यर्थ हैं। देवयानी सरोवर पौराणिक धार्मिक स्थल होने के बाद भी आज भी अपनी बदहाली पर रो रहा हैं। गन्दगी से पटा पड़ा ये सरोवर में न तो कोई अधिकारी और न ही यहां आये श्रृद्धालु ध्यान दे रहे हैं। परिणाम स्वरूप हर तरफ
गन्दगी ही गन्दगी देखने को मिल रही हैं।

 

जनपद कानपुर देहात के मूसानगर स्थित देवयानी सरोवर, जो बहुत प्राचीन सरोवर है। जहां पितृपक्ष में लोगों का सैलाब उमड़ता है। क्योंकि यहां यमुना जी के उत्तर गामिनी होने से प्रथम पिंडदान का विशेष महत्व है। पितृपक्ष में लोग भारी तादात में यहां आकर अपने पूर्वजों को प्रथम पिंडदान करते है।

 

पितरों को शांत करने की ये विशेष परम्परा है। कहा जाता है कि इंसान को जीवन में गया का फल जरूर प्राप्त करना चाहिये। लेकिन मान्यता है कि देवयानी सरोवर में पितरों का श्राद्ध किये बिना गया जी का फल पूरा नहीं होता है। वही देवयानी सरोवर में गन्दगी ही गन्दगी देखने को मिली। गंदगी का आलम देख यही प्रतीत होता है कि कभी साफ सफाई नहीं होती है। न कोई प्रशासनिक अफसर इस ओर ध्यान देते है।

देवयानी सरोवर को लेकर एक प्राचीन मान्यता है कि प्राचीनकाल में मूसानगर में यहां एक घना जंगल था। एक बार दैत्यराज वृषपर्वा की बेटी शर्मिष्ठा व दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी दोनों उस जंगल में घूमने गयी। जंगल में सरोवर देख दोनों निर्वस्त्र होकर स्नान करने लगी। भगवान शंकर के उधर से गुजरने पर देवयानी ने जल्दबाजी में शर्मिष्ठा के कपड़े पहन लिये। तो शर्मिष्ठा ने गुस्से में आकर देवयानी को कुएं में धक्का दे दिया। तभी वहां से गुजर रहे जाजमऊ के राजा ययाति ने चीख पुकार सुन देवयानी को बाहर
निकाला।

 

इसके बाद शुक्राचार्य ने देवयानी का विवाह राजा ययाति से कर दिया। इधर शुक्राचार्य के नाराज होकर जाने की बात सुनकर दैत्यराज वृषपर्वा ने शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बना दिया। इसके बाद ययाति ने सरोवर का भव्य निर्माण करा दिया।

देवयानी सरोवर को पितृपक्ष से लेकर दीपदान के धार्मिक कार्यक्रमों और पौराणिक मान्यता के अनुसार विशेष माना गया हैं। पितृपक्ष में पिण्ड दान करने का महात्व को बताते हुए इसे छोटी गया के नाम से जाने वाला यह पौराणिक और धार्मिक स्थल आज अपनी बदहाली के आंसू बहा रहा हैं। न तो यहां साफ-सफाई है और न ही इस सरोवर की देखरेख। सरोवर में हर तरफ गंदगी ही गंदगी देखने को मिल रही हैं। ग्राम पंचायत से लेकर जिला प्रशासन तक इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।

Ruchi Sharma
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