गीत गाकर वोट मांगते थे कवि नीरज, जनता आज भी करती है याद

गीत गाकर वोट मांगते थे कवि नीरज, जनता आज भी करती है याद

Neeraj Patel | Publish: Apr, 01 2019 11:45:19 AM (IST) Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

आजादी के बीस साल बाद हिन्दी के लाड़ले कवि गोपाल दास नीरज ने भ्रष्टाचार और अपराध के बढ़ते प्रभाव को देखकर लोकसभा चुनाव लड़ने का बनाया था मन, जानिए कैसे भरा था पर्चा

कानपुर. आजादी के बीस साल बाद हिन्दी के लाड़ले कवि गोपाल दास नीरज ने भ्रष्टाचार और अपराध के बढ़ते प्रभाव को देखकर लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया और कांग्रेस से टिकट की दावेदारी की। इस पर कांग्रेस ने कवि नीरज को कानपुर से टिकट देने का वादा भी किया लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया। इसके बाद नाराज उनकी मित्र मंडली और छात्र संघ ने चंदा किया और कलम के जादूगर गोपाल दास नीरज ने 1967 के आमचुनाव में कानपुर सीट से पर्चा भर दिया।

कवि गोपाल दास नीरज की सभाओं में लोगों की भीड़ जमा करने के लिए अनूठा चुनावी अभियान चलाया। उसमें वे गीत गाते तो लोग झूमते पर वे साफ कहते, जो चोर, भ्रष्ट व अपराधी हैं, वे मुझे वोट न दें। उनका यह अनूठा चुनावी अभियान कानपुर की गलियों में लोग आज भी खूब याद करते हैं और कहते कि वे चुनाव भले नहीं जीते, लेकिन कानपुर का दिल जीत चुके थे।

जनता से मिला प्यार

दोस्तों के कहने पर गोपाल नीरज यह चुनाव लड़ने के लिए राजी हुए थे। जगह-जगह नुक्कड़ नाटक किए गए और कानपुर गलियों में गीत गाकर भी वोट मांगे। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़े। कानपुर की जनता से उन्हें बहुत प्यार मिला। जब चुनाव का परिणाम सामने आया तो बनर्जी ने जीत हासिल की और कांग्रेस का कैंडीडेट दूसरे नंबर था, जबकि गोपाल दास नीरज तीसरे नंबर थे।

कांग्रेस के चलते हुई हार

कवि नीरज के मित्र राजीव गुप्ता बताते हैं, दरअसल उस समय के कांग्रेस नेतृत्व का गेम प्लान था। कांग्रेस चाहती थी कि कवि नीरज चुनाव लड़ें। नीरज मान गए तो इसकी जानकारी कांग्रेस नेतृत्व को दी गई, पर ऐन मौके पर कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। दृढ़संकल्प से भरे नीरज ने तय किया कि अब वे निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। वे निर्दलीय मैदान में उतर गए। जोरदार चुनाव अभियान चला। पूरे शहर में व्यापक चर्चा रही। नीरज चुनाव तो नहीं जीते, किन्तु जनता का दिल जीतने में सफल रहे। उन्हें धोखा देने वाली कांग्रेस भी यह चुनाव नहीं जीत सकी। राजीव गुप्ता बताते हैं कि नीरज को और अधिक सफलता मिलती, किन्तु मतदान के ठीक पहले उनके चुनाव मैदान से हटने की चर्चा हो गई थी जिसका उन पर प्रतिकूल असर पड़ा।

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