बुंदेलखंड के नहीं बदले हालात, पहले की तरह जख्म बरकरार

Vinod Nigam

Publish: Mar, 17 2019 01:43:45 PM (IST)

Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

कानपुर। लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद यूपी की सियासत गर्म है। बुंदेलखंड की बंजर भूमि में सपा-बसपा गठबंधन और भाजपा के बीच काटे की टक्कर होनें की उम्मीद है। इसी बीच पत्रिका टीम ने मौके पर जाकर जमीनी हकीकत परखी। बुंदेलों के मिजाज को टटोला। मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान कितने हालात बदले इस पर ग्रामीणों राय जानी। अधिकतर ग्रामीणों ने कहा कि कहा, पहले खेत सूखे, फिर पेट सूखे, नदी-नाले सूखे और अब हलक सूखे। पिछले चालीस सालों के सबसे भयावह सूखे से जूझ रहे आज के बुंदेलखंड कीयही असल तस्वीर है। खेतों में अर्से से वीरानियां हैं। गांव-देहात बूढ़े और महज लाचार लोगों की बस्तियां हैं सरकार।

नहीं मिला योजनाओं का लाभ
लोकसभा चुनाव का प्रचार-प्रसार शुरू हो गया है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर रहे हैं। पत्रिका टीम भी इस समय में सड़क पर उतरी। गांव, गली मोहल्लों की खाक छानी। मोदी सरकार के कार्यकाल के बारे में जनता से उनकी राय जानी। यमुना नदी के किनारे बसे हमीरपुर के केवलारी गांव में आज भी समस्या पहले की तरह ही दिखीं। टाॅयलेट, सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पीएम आवास सहित एक भी योजना इन गांव में नहीं पहुंची। करीब 300 मुस्लिम वोटर्स वाले इस गांव में जख्म ही जख्म दिखे। आसमा, जुबेरा, कमलावती, रजनी देवी सहित अन्य महिलाओं ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले पीएम नरेंद्र मोदी महोबा में रैली के लिए आए थे। उनका भाषण सुनकर एक पक्ष में कमल के पक्ष में वोट पड़े, लेकिन हमारे जख्म ज्यों के त्यों बरकरार हैं।

फिर भी मोदी पर विश्वास
ग्रामीणों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांवों के विकास के लिए पैसा तो भेजा, लेकिन उनके जनप्रतिनिधि और सरकारी बाबुओं ने उसे कागजों में खर्च कर दिया। रज्जाक और विशम्भर कहते हैं हमें अभी भी देश के चैकीदार पर विश्वास है। 2019 में यदि वो सत्ता पर आते हैं तो बुंदेलखंड में जरूर बदलाव आएगा। ग्रामीणों ने बताया कि बुंदेलखंड की बदहाली की जो तस्वीर लखनऊ और दिल्ली में यहां से भेजी जाती है, वो पूरी तरह से गलत है। स्थानीय नेताओं ने यहां की असल बीमारी को गलत तरीके से पेश कर खानापूर्ति की।

नशा सबसे बड़ा रोग
अगर आर्थिक पक्ष से देखा जाए तो हमीरपुर और महोबा संसदीय सीट की गिनती अमीर लोकसभा में होती है। यमुना सहित कई नदियों के अलावा पहाड़ व अन्य प्राकृतिक संपदा से भरपूर हमीरपुर को बर्बाद नशे ने किया है। सफेदपोश और माफिया ने मिलकर यहां के युवाओं को नशे का लती बना उन्हें मजदूर बना लिया है। यमुना की रेंत तो पहाड़ों की गिट्टी में सुबह से लेकर देररात तक ग्रामीण पसीना बहाते हैं। बदले में उन्हें तीन से चै सौ रूपए प्रतिदिन कि हिसाब से मिल जाते हैं। इस पैसे को घर में लाने के बजाए नशे में मजदूर उड़ा देते हैं और फिर यहीं से उनकी बदहाली की कहानी शुरू होती है और मौत तक जारी रहती है।

शिक्षा से दूर होगी बदहाली
झांसी विश्वविद्य़ालय के राजनीति शास्स्त्र के रिटायर्ड प्रोफेसर आरके सिंह कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले युवाओं को फावड़े के बजाए कमल की व्यवस्था करनी होगी। यहां शिक्षा की लौ के जरिए ही गरीबी से जंग जीती जा सकती है। प्रोफेसर बताते हैं कि आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मनुलाल द्विवेदी जीतकर सांसद पहुंचे थे। 1977 में लोकदल ने रोका। भारतीय लोकदल से तेज प्रताप चुनावी मैदान में उतरे और जीत दर्ज की। तेज प्रताप ने गांवों में स्कूल पहुंचाए। उनके चलते सुमेरपुर में फैक्ट्रियां लगीं। उन्होंने नहरों का जाल बिछाया, लेकिन 1980 में कांग्रेस ने यहां से चुनाव जीता और फिर ये जिला बदहाली की तरफ बढ़ चला।

सरकार चाहिए पानी
बुंदेलखंड हमेशा से सियासत का बड़ा मुद्दा रहा है। इस बार भी केंद्र और राज्य सरकारें दावों-प्रतिदावों की खूब सियासत कर रही हैं लेकिन अगर सियासी रहनुमा इस इलाके का हवाई दौरा भी करें तो आंखें खोल देने वाली हकीकत सामने आएगी। पत्रिका टीम ने कई गांव के दौरा किया और अब तक की जो तस्वीर देखी, वो पढ़कर आपको इसकी भयावहता का अंदाज हो जाएगा। बुंदेलखंड में सूखे का असर यहां के बांधों पर भी पड़ रहा है। पिछले कई साल से औसतन वर्षा न होने के कारण अधिकांश बांधों में पानी नहीं है। आसपास के गांवों का जलस्तर तो बहुत नीचे पहुंच ही गया है। अधिकांश कुएं व हैंडपंप भी साथ छोड़ चुके हैं। जानवरों तक के लिए पानी तो दूर अब वे तलहट की कीचड़ में फंस कर दम तोड़ रहे हैं। यही कारण हैं कि यहां की अधिकतर जमीन बंजर पड़ी हुई है।

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