गवईया के जाने के बाद रो पड़ा मवईया, समस्याओं से जूझते ग्रामीणों को हंसाते थे भईया

कवि प्रमोद तिवारी के निधन के बाद पैतृक गांव के लोग उदास, ग्रामीण उन्हें प्यार से बुलाते थे भईया

By: Vinod Nigam

Published: 13 Mar 2018, 10:43 PM IST

कानपुर। मैं कबीर-तुलसी का वंशज, दरबारों में नहीं मिलूंगा, सच्ची घटना हूं मैं तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा। दिल की हो या आंगन की हो, दीवारों में नहीं मिलूंगा, चाहे हाथ भले कट जाएं तलवारों में नहीं मिलूंगा।। जो कहना कहूंगा अभी, जो करना है करूंगा भी, हवाओं से लड़ूंगा भी और अंधेरों को खलूंगा भी। न सोचा है मिलेगा क्या, न सोचूंगा मिला क्या है, दीया हूं तो जलूंगा भी और जलूंगा तो बुझूंगा भी। यह पंक्तियां शिवली के मवईया गांव निवासी कवि व पत्रकार और गीतकार प्रमोद तिवारी के हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्नाव के पास सड़क हादसे में उनका निधन हो गया। यह खबर जैसे उनके पैतृक गांव पहुंची तो वहां शोक की लहर दौड़ पड़ी। युवा, जवान बुजुर्ग अया महिला हर व्यक्ति अपने भईया के इस दुनिया से चले जाने काफी दुखी दिखा। बुजुर्ग धनश्याम बाजपेयी कहते हैं कि वह साल में कईबार गांव आते और चौपाल के जरिए ग्रामणों की समस्या सुनते और उनका कविताओं के जरिए निराकरण कुछ हद तक उसे हंसाकर दूर कर देते थे। पर भईया अब कभी नहीं आएंगे, गलियों में उनकी कविताओं की गूंज नहीं सुनाई देगी।
मवईया गांव में हुआ था जन्म
मशहूर कवि प्रमोद तिवारी का जन्म 31 जनवरी 1960 को शिवली थानाक्षेत्र के गांव मवईया में हुआ था। इस समय वह कानपुर नवाबगंज के पत्रकार पुरम में रह रहे थे। पढ़ाई कानपुर के डीबीएस कॉलेज से की और हिन्दी एमएम यहीं से किया। 1988-89 में प्रमोद ने कैरियर की शुरुआत एक समाचार पत्र से की। वर्ष 2001-02 में समाचार पत्र छोड़कर लोकल अखबार निकाला। अखबार में काम करने के दौरान वह अक्सर कहा करते थे कि मैं न तो पत्रकार हूं और न ही साहित्यकार, मैं शब्दकार हूं और इसी की पालकी में सवार होकर धाम जाऊंगा। अपनी कविताओं से लाखों दिलों में अपनी एक खास जगह बनाने वाले मशहूर कवि प्रमोद तिवारी अब हमारे बीच नहीं हैं। अपने गीतों और कविताओं के रूप में वह प्रशंसकों के लिए हमेशा जिंदा रहेंगे। मवईया गांव निवासी रिटायर्ड सेना के जवान ने बताया कि पांच साल पहले हम छुट्टी लेकर गांव आए थे। सुबह जानकारी मिली की प्रमोद भईया गांव आए हैं। हम उनसे मिलने के लिए पहुंचे और पैर छुए तो उन्होंने एक कविता के जरिए हमें आर्शीवाद दिया। उनके जाने से कानपुर के साथ ही पूरे देश को बहुत बड़ी क्षति हुई है।
इस लिए पत्रकार बने
उनके मित्र सुभाष कहते है कि उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने के पीछे की कहानी हमें बताई थी। प्रमोद तिवारी एक कविता लिखी थी, जिसका प्रकाशन करवाने के लिए वह एक अखबार के कार्यालय गए। वहां उनकी मुलाकात अखबार के संपादक से हुई। कविता पढ़कर संपादक गदगद हो गए और उन्हें अखबार में काम करने का ऑफर दिया। पहले उन्होंने पत्रकार बनने से मना कर दिया, पर संपादक के कहने पर वह मान गए। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रमोद तिवारी निडर और बेदाग कार्य किया। वह प्रेस क्लब के पंद्रह साल तक महामंत्री के पद पर रहे। ख्ुद का अगखर निकाला, लेकिन मन समाचार लिखने के बजाए कविताओं की तरफ रहता। संभाष बताहे हैं कि अयोध्या बाबरी विध्वंस के बाद जब कानपुर में दंगा भड़का तो गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह शहर की सड़कों पर निकले। लोगों को आपसी-भाईचारा बनाए रखने की अपील की और कलम के दम पर शासन-प्रशासन के साथ आवाम को जगाया।
बॉलीबुड में भी गाए गीत
नवाबगंज निवासी कवि सुभाष कहते हैं कि प्रमोद जी की कविताओं में देश-प्रेम के साथ समाज के लिए संदेश होता था। उनकी एक कविता जो कुछ पहले नवाबंगज गणेश महोत्सव के दौरान सुनाई थीं, चले जाएंगे लेकिन जिंदगी में कुछ लाइनें छोड़ जाएंगे, जो आपको गुनगुनानी पड़ेंगी। आज भी हमारे जेहन में है। नवाबगंज के सलीम फतेहाबादी कहते हैं प्रमोद जी पूरी जिंदगी आवाम को जगाते और हंसाते रहे। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह निडर होकर कलम के जरिए लोगों की आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाया, वहीं कविताओं के जरिए भाग-दौड़ से थके लोगों को गुदगुइाते रहे। पूर्व प्रेस क्लब के अध्यक्ष तनवीर हैदर ने बताया कि प्रमोद वरिष्ठ पत्रकार के साथ-साथ गीतकार भी थे। उन्होंने कवि सम्मेलनों में मंच साझा करने के साथ ही फिल्मों में भी गीत गाया। अभिनेता धर्मेंद्र की आने वाली फिल्म अपने-2 में उन्होंने गीत भी गाया है। अभी यह फिल्म रिलीज होने वाली है। आने वाली फिल्म को लेकर वह बहुत उत्साहित थे। परिजनों में भी काफी उत्साह था। होली पर्व से पहले हमारी मुलाकात उनसे हुई और जमकर हंसी ठहाके लगाए।

 

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