Independence Day 2019: नानाराव पेशवा के इस ‘डोभाल’ से थर-थर कांपते थे अंग्रेज

Independence Day 2019: नानाराव पेशवा के इस ‘डोभाल’ से थर-थर कांपते थे अंग्रेज

Vinod Nigam | Publish: Aug, 15 2019 08:15:03 AM (IST) Kanpur, Kanpur, Uttar Pradesh, India

बुदंलखंड में आकाल के चलते मां के साथ कानपुर आए थे अजीमुल्ला, नानाराव पेशवा ने बनाया प्रधानमंत्री और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ने के लिए रणनीति की सौंपी थी जिम्मेदारी।

कानपुर। क्रांतिभूमि कही जाने वाली इस धरा की माटी में कुछ ऐसी तासीर जरूर थी, तभी तो एक मासूम भूखा बच्चा अकाल से बचकर कानपुर आता है और फिर बन जाता है क्रांति का कुशल रणनीतिकार। जिसका नाम सुनकर अंग्रेज सैनिक उल्टे पांच भागने को मजबूर हो जाया करते थे। वह कोई और नहीं महान क्रांतिकारी अजीमुल्ला थे। जिन्हें नानाराव पेशवा ने प्रधानमंत्री के साथ जासूसी का काम सौंपा था। अजीमुल्ला के बनाए प्लाॅन में अंग्रेज सिपाही फंस जाते और देश की वीर सपूत उन्हें मौत के घाट उतार दिया करते थे। अजीमुल्ला का नाम सुनकर ब्रिटिश हुमूमत के बड़े-बड़े कमांडर डर कर अपनी बैरक में लौट जाया करते थे।

कौन थे अजीमुल्ला
1857 की क्रांति के महानायकों के रूप में कानपुर के अजीमुल्ला खां का नाम भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि अजीमुल्ला खां का जन्म बुंदेलखंड के जालौन जिले में हुआ था। 1834 में बुंदेलखंड में भीषण आकाल पड़ा था। सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गए थे। अजीमुल्ल अकाल से बचकर अपनी मां के साथ कानपुर आए और यहां परेड के पास झोपड़ी में रहने लगे। अजीमुल्ला और उनकी मां कई दिनों तक भूखे रहे। इस दौरान वह भिक्षा मांग कर पेट भरते थे।

ऐसे की पढ़ाई
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं, परमठ मंदिर के पास अजीुल्ला अपनी मां के साथ सड़क के किनारे बैठे थे। तभी एसपीजी मिशन के संस्थापक रेव कारशोर की नजर उन पर पड़ी और वह उन्हें अपने घर ले आए। रेव कारशोर ने मां और बेटे को अपने घर में नौकरी पर रख लिया। घर का कामकाज करने के बीच ही अजीमुल्ला खां ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा सीख ली। बाद में कारशोर की ही उत्तराधिकारी पर्किन्स ने अजीमुल्ला को फ्री स्कूल (वर्तमान में क्राइस्ट चर्च कॉलेज) में दाखिला करा दिया। जल्द ही वहां उन्हें अनुवादक की नौकरी भी मिल गई।

नानाराव ने बनाया प्रधानमंत्री
मनोज कपूर बताते हैं, 1850 में अजीमुल्ला खां की मुलाकात बिठूर में नानाराव पेशवा से हुई। पेशवा उनकी बौद्धिक क्षमता, सूझबूझ से प्रभावित हुए। उन्हें सरकार में विदेश मंत्री और फिर प्रधानमंत्री बना दिया गया। इस बीच अंग्रेज सरकार ने नानाराव पर शिकंजा कसते हुए उनकी पेशन बंद करवा दी। नानाराव ने अपने खास रणनीतिकार अजीमुल्ला को खां को 1853 में इंग्लैंड भेजा। अजीमुल्ला वहां क्वीन विक्टोरिया से मिलने बकिंघम पैलेस पहुंचे। नानाराव पेशवा की बात उन तक पहुंचाई, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

फिर बने जासूस
इंग्लैंड के बोर्ड ऑफ कंट्रोल ने अजीमुल्ला की मांग को ठुकरा दिया तो वह वहां से गायब हो गए। मार्च 1854 में अजीमुल्ला तुर्की पहुंचते हैं। वहां क्रीमिया का युद्ध चल रहा था तो अंग्रेजों के शिविर में चुपचाप दाखिल हो जाते हैं और रात भर रहते हैं। वहां से तमाम जानकारियां जुटाने के बाद निकल जाते हैं। कपूर बताते हैं, तुर्की के बाद अजीमुल्ला खां फ्रांस पहुंचे थे। वहां से टुकड़ों में तस्करी कर प्रिंटिंग प्रेस भारत लाकर अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे छापकर क्रांति की आग जन-जन तक पहुंचाई। इसी प्रिंटिंग प्रेस से 1855 में रिसाला जेहाद और फिर 1857 की जंग के दौरान पयामे आजादी नाम से मशहूर पत्र छापा गया।

तात्या टोपे के साथ देखा गया
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि क्रांति के दौरान जब सत्ती चैरा घाट पर अंग्रेज आक्रांताओं का कत्ल किया गया, तब आखिरी बार अजीमुल्ला खां को तात्या टोपे के साथ देखा गया। कपूर कहते हैं इस लड़ाई के बाद अजीमुल्ला के बारे में किसी के पास कोई ठोस तत्य नहीं है। कहते हैं, कुछ इतिहासकारों ने अजीमुल्ला को तुर्की के सुल्तान ने बुलाकर राजनीतिक सलाहकार बना लिया तो कोई कहता है कि नानाराव पेशवा के साथ रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई। लेकिन यदि सत्ती चैरा की लड़ाई की बात की जाए तो यहां पर अजीमुल्ला के होने के पुख्ता प्रमाण हैं।

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