21 साल बाद फिर कोई महिला बनेगी मेयर

Ashish Pandey

Publish: Oct, 13 2017 04:02:41 (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
21 साल बाद फिर कोई महिला बनेगी मेयर

बीजेपी को मात देने के लिए हरकत में आया विरोधी खेमा.

कानपुर। उत्तर प्रदेश के सीएम अपने पूरी कैबिनेट के साथ शहर के भौंती स्थित एक इंजीनियरिंग कॉलेज में निकाय चुनाव को लेकर सगंठन के साथ रणनीति बनाने के लिए आए थे। छह घंटे तक चली बैठक के बाद भाजपा पादिधकारियों को कमल खिलाने का फार्मूला देकर रवाना कर दिया गया। शासन ने भी देररात यूपी के 16 मेयर व 636 अध्यक्षों की सीटों का आरक्षण जारी कर दी। जिसके चलते कानपुर की मेयर की कुर्सी पर 21 साल के बाद महिला कैंडीडेट बैठेगी। महिला सीट की जानकारी मिलते ही कई दवोदार पार्टी के अपने खास नेताओं के साथ संपर्क बनाने लगे। यहां बीजेपी के अंदर ही कई महिला दावेदार हैं, जिन्होंने टिकट पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया। वहीं विरोदी दल के नेता भी सक्रिय हो गए हैं और इसबार भाजपा को पटखनी देने के लिए रणनीति बनाने में जुट गए हैं।
21 साल फिर से महिला महापौर
शासन ने देररात मेयर पर की सीट के लिए आरक्षण जारी कर दिया और 21 साल के बाद कानपुर की मेयर महिला होने जा रही हैं। इसी के चलते पुरूष दावेदार खासे निराश दिखे और अपनी पत्नियों को टिकट दिलाने के लिए जुट गए हैं। 1996 में कानपुर की सीट महिला हुई थी, तब भाजपा की सरला सिंह भारी मतों से जुनाव जीतकर नगर निगम पहुंची थीं। 2002 में कानपुर की मेयर की कुर्सी पर पुरूष ही विराजमान होते रहे हैं। 2000 में कांग्रेस के अनिल कुमार शर्मा मेयर चुने गए। इसके बाद तीन चुनाव लगातार भाजपा जीतती आ रही है और चौथी विजय दर्ज करने के लिए पिछले कई माह से जमीन पर उतरकर रोडमैप मना रही है। जबकि विरोधी दलों में सरगर्मियां कम ही दिखीं। लेकिन देररात के बाद वे भी हरकत में आ गए हैं और भाजपा को हराने के लिए प्लॉनिंग कर रहे हैं।
बदल गए राजनीतिक समीकरण
मेयर सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाने के बाद राजनीतिक दलों के समीरकण बदल गए हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा में आम कार्यकर्ताओं तक में सटीक प्रत्याशी के दावेदारी पर बहस छिड़ चुकी है। आजादी के बाद से कानपुर में सिर्फ एक बार महिला मेयर चुनी गई, वो भाजपा की सरला सिंह थीं। भाजपा नगर अध्यक्ष सूरेंद्र मैथानी ने कहा कि हमारी पार्टी में कई महिला कार्यकर्ता हैं जो मेयर की दावेदार हैं। पार्टी उसे ही टिकट देगी, जो ज्यादा से ज्यादा समय जनता के साथ रहा होगा। पार्टी उसी को अपने कैंडीडेट बनाएगी जिस पर कोई अपराधिक मामला नहीं होगा। दिवाली के बाद मेयर के नाम की घोषण हो सकती है। हाईकमान की तरफ से जैसे ही नाम मांगे जाएंगे, वैसे ही उन्हें मुहैया करा दिए जाएंगे। जुगाड़ नहीं काम करने वाले को वरीयता दी जाएगी।
तो कांग्रेस के साथ आ सकते हैं सपा-बसपा
पिछले तीन बार से कानपुर के मेयर की कुर्सी पर भाजपा का प्रत्याशी जीतता आया है और चौथी विजय के लिए जमीन पर काम चल रहा है। वहीं कांग्रेस, सपा और बसपा के पास वर्तमान में भाजपा को कड़ी टक्कर देने के लिए कोई कैंडीडेट नहीं है। इसी के चलते 2017 में भाजपा को पटखनी देने के लिए पंजे के साथ साइकिल और हाथी आ सकते हैं। 2012 के चुनाव में बसपा के सलीम ने मुस्लिम वोट काटकर कांग्रेस के अरमानों पर पानी फेरा था। महापौर पद पर भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण ने कांग्रेस के पवन गुप्ता को 53,323 वोट से हराया था। द्रोण को 2,93,634 वोट मिले जबकि पवन को 2,40,311 से संतोष करना पड़ा। पवन और द्रोण को छोड़ महापौर के बाकी सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। इसी के चलते सपा और बसपा अपने कैंडीडेट न उतारकर कांग्रेस को बाहर से सपोट कर सकती है।
ये रहे दावेदारों के नाम
सत्तादल भाजपा में टिकट की दावेदारी सबसे ज्यादा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक महिला मोर्चा की पादाधिकारी कमलावती सिंह, जिलापदाधिकारी पूनम कपूर, वरिष्ठ नेता प्रेमिला पांडेय, गीता मिश्रा, बीना आर्या के अलावा निवर्तमान पार्षद रीता शास्त्री, पूनव द्धिवेदी प्रमुख दावेदार मानी जा रही हैं। कांग्रेस में दो प्रमुख नाम सामने आ रहे हैं, जिसमें आलोक मिश्रा की पत्नी वंदना, पूर्व पार्षद आरती दीक्षित के अलावा उर्षा रतनाकर शुक्ला के नाम की चर्चा चल रही है। आलोक ने सामान्य सीट होने पर खुद ही दावेदारी ठोंक रखी थी। सपा से विधायक अमिताभ बाजपेयी की पत्नी वंदना, नीलम रोमिला सिंह, उजमा सोलंकी, कीर्ति अग्निहोत्री, अर्पणा जैन दावेदार मानी जा रही हैं।

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