तिल की फसल में रोग से किसान चिंतित

तिल की फसल में रोग से किसान चिंतित
बम्पर पैदावार की उम्मीदें धूमिल, किसान हुए हैं मायूस
करौली जिले में टोडाभीम उपखण्ड के बालघाट क्षेत्र में तिल की व्यापक पैदावार होती है। इस इलाके में बालघाट, भण्डारी, नांगल, शेरपुर, सिंघनिया, पहाड़ी, मोरडा, कमालपुरा, करीरी आदि गांवों के किसानों की तिल की पैदावार करने के लिए पहचान है। इसका कारण है कि पहाड़ी की तलहटी में ये गांव बसे हैं जहांपानी की उपलब्धता के कारण ही इस इलाके के किसान तिल की पैदावार करने को फायदेमंद मानते हैं।

By: Surendra

Updated: 05 Sep 2020, 06:50 PM IST

तिल की फसल में रोग से किसान चिंतित
बम्पर पैदावार की उम्मीदें धूमिल, किसान हुए हैं मायूस
कर रहे हैं बचाव के उपाय और अनुदान की मांग
बालघाट (टोडाभीम) करौली जिले में टोडाभीम उपखण्ड के बालघाट क्षेत्र में तिल की व्यापक पैदावार होती है। इस इलाके में बालघाट, भण्डारी, नांगल, शेरपुर, सिंघनिया, पहाड़ी, मोरडा, कमालपुरा, करीरी आदि गांवों के किसानों की तिल की पैदावार करने के लिए पहचान है। इसका कारण है कि पहाड़ी की तलहटी में ये गांव बसे हैं जहां बारिश का पानी का भराव हो जाता है जिससे इस इलाके में तिल के पर्याप्त पानी उपलब्ध होता है। पानी की उपलब्धता के कारण ही इस इलाके के किसान तिल की पैदावार करने को फायदेमंद मानते हैं।
हालांकि इस बार तिल की फसल में रोग लगने से किसान मायूस हो रहे हैं।
इस वर्ष तिल की पैदावार बीते वर्ष से काफी अधिक एरिया में हो रही है। किसानों को तिल की बंपर पैदावार होने की उम्मीदें भी थी, लेकिन क्षेत्र में तिल की फसल रोगग्रस्त होने से फसल पर बुरा असर दिखाई दे रहा है। इलाके के किसानों ने बताया कि इस बार बारिश में देरी होने पर उन्होंने तिल की बुआई कुंओं से सिंचाई करके शुरू की थी।
इसके बाद निढ़ाई, निनाणी (खरपतवार), यूरिया खाद आदि सभी कार्य पूरे किए तथा अब तिल की फसल के फूल व फली लगना जारी है। कुछ समय में फसल पकने की उम्मीद की जा रही हैं। लेकिन इस बीच तिल की फसल में काला रोग लगने से कई खेतों में फसल को नुकसान की आशंका है। इससे किसान चिंतित दिखाई दे रहे हैं। उनको बम्पर पैदावार की उम्मीद पर पानी फिरता दिख रहा है।
तिल में लगा काला रोग ड्राई रूट्स डाइसेस के नाम से जाना जाता है। यह रोग फफूंदी (फंगस) के कारण होता है, जिसका फंगस बीज में रहता है। मृदा के तापमान व नमी की स्थिति के कारण इसका भोजन विकसित होता है, जो पौधे की मृदा की सतह के पास तने व जड़ में भूरा काला लक्षण प्रदर्शित करता है। इस कारण पौधे नीचे गिर जाते है और नष्ट हो जाते हैं।

फंगस की चपेट में तिल की फसल, अनुदान की मांग-
बालघाट क्षेत्र में लगातार चल रही बारिश और आसमान में छाए बादलों से यहां इस बार होने वाली तिल की बंपर पैदावारी ग्रहण लग चुका है। इसके कारण किसानों को तिल की फसल के नुकसान की चिंता सता रही है। प्रगतिशील किसान शिवदयाल मीणा ने बताया क्षेत्र में कम मेहनत अधिक मुनाफा की लालसा से क्षेत्र के किसानों ने इस बार बाजरा से ज्यादा तिल की बुबाई की थी लेकिन उसमें फंगस रोग लग जाने के कारण वह चौपट हो गई। इस बारे में उन्होंने उपखंड अधिकारी के साथ कृषि उपनिदेशक करौली को भी फसल के नुकसान के बारे में अवगत कराया है लेकिन अभी तक कोई मदद नहीं मिल सकी है। कृषि पर्यवेक्षक सुधीर कुमार मीणा ने बताया इस बार क्षेत्र में 450 हेक्टेयर भूमि में तिल की बुवाई हुई थी जिसमें फंगस रोग लग जाने के कारण करीब 250 हेक्टेयर भूमि में तिल की फसल को नुकसान पहुंचा है।

ये बताए उपचार

कृषि पर्यवेक्षक सुधीर कुमार मीणा ने बताया कि इसके बचाव के लिए तिल की फसल में बोआई से पूर्व बीज उपचार किया जाना जरूरी है। अगर बीज उपचार नहीं किया गया है तो इस समय यह रोग 'फाइटोफ्थोरा पैरासिटिकाÓ नामक फफूंद से होता है। सभी आयु के पौधों पर इस रोग का हमला हो सकता है। पुष्प अवस्था तक पौधे इसकी ज्यादा चपेट में आते हैं। शुरू में यह रोग जमीन की सतह के साथ पौधों के तनों पर नम काले दागों के रूप में दिखाई पड़ता है। इससे तनों पर काली धारियां बन जाती हैं और रोग ज्यादा फैलने से पौधों की मौत हो जाती है।उन्होंने बताया कि इसके उपचार के लिए एक खेत में लगातार तिल की बोआई न करें। बोआई के लिए अच्छी, रोग रहित व रोगरोधी किस्म का चुनाव करना चाहिए। संक्रमण रोकने के लिए बोआई से पहले 0.3 फीसदी थीरम, केप्टान या रिडोमिल से बीजोपचार करें। रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही फसल पर मैंकोजेब 0.2 फीसदी या कॉपर ऑक्सीक्लोराइट 0.3 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए।

Surendra Bureau Incharge
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