बुजुर्गों की जुबां पर आज भी आते हैं कई दशकों पहले आई महामारी के किस्से

गुढ़ाचन्द्रजी. कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में खौफ है। लोग घरों में कैद है। इस प्रकार की महामारी माड़ क्षेत्र में आजादी से पहले भी होती आई है। जो इतिहास के पन्नों में है। पहले इस प्रकार की महामारी को 'मरीÓ के नाम से लोग जानते थे।

गुढ़ाचन्द्रजी. कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में खौफ है। लोग घरों में कैद है। इस प्रकार की महामारी माड़ क्षेत्र में आजादी से पहले भी होती आई है। जो इतिहास के पन्नों में है। पहले इस प्रकार की महामारी को 'मरीÓ के नाम से लोग जानते थे। जिस क्षेत्र में यह महामारी का प्रकोप होता था वहां से लोग अपने गांव को छोड़कर कोसों दूर चले जाते थे।
तिमावा के पूर्व सरपंच रामखिलाड़ी मीना, ढहरिया के सेवानिवृत्त व्याख्याता रामराज मीना के अनुसार करीब सौ वर्ष पहले माड़ क्षेत्र में 'मरीÓआई थी तब एक व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर घर आते तो दूसरा भी व्यक्ति मौत के मुंह में चला जाता। इस प्रकार की मौतों से कई गांव वीरान गए।
जड़ी बूटियों से होता था इलाज
बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी से पहले गांवों में ना तो उपचार के साधन थे और ना ही आज की तरह आवागमन के साधन। पहले गांवों में उपचार देशी जड़ी-बूटियों से होता था। आवागमन के साधन के नाम पर बैलगाड़ी थी। जिनके पास बैलगाड़ी होती थी उनको धनाढ्य माना जाता था। निर्धन व्यक्ति तो पैदल ही चल सकता था। बुजुर्ग ल्होडच्या राम गुर्जर व जैला मीना बताते है कि एक से लक्षण वाली बीमारी से जब गांव में कई लोगों की मौत हो जाती है तो उसे मरी नाम की बीमारी की संज्ञा दी जाती थी। वैद्य-हकीम जड़ी-बूटियों से ईलाज करते थे।
अंकुश नहीं लगने पर जाते देवताओं की शरण में
जब बीमारी पर अंकुश नहीं लगता था तब लोग देवी-देवताओं की शरण में जाते थे। जहां कई दिनों तक ढोलक की आवाज पर बखान कर गोठ गाते थे। साथ ही देवता से बीमारी को दूर भगाने क ी अरदास लगाते।
इस मरी नाम की महामारी का उल्लेख बड़े-बुजुर्गो के किस्सों के साथ किदवंतियों में है। साथ ही वंशजों की गिरदावली सुनाने वाले भाटों की बहियों में भी इस मरी नाम की बीमारी का उल्लेख आता है।

Jitendra Desk
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