करौली में नर्सरी व्यवसाय को इस तरह से मिली नई पहचान

दो दशक पहले 1600 रुपए से शुरू किया व्यवसाय लाखों में पहुंचा
युवा दिवस विशेष

By: Dinesh sharma

Published: 12 Jan 2021, 04:24 PM IST

दिनेश शर्मा
करौली. करीब 22 वर्ष पहले महज 1600 रुपए की लागत से शुरू की गई नर्सरी आज लाखों के टर्नओवर के साथ महक रही है। नर्सरी के व्यवसाय ने ना केवल परिवार को आर्थिक संबल प्रदान किया, बल्कि करौली क्षेत्र में नर्सरी व्यवसाय को भी नई पहचान बनाई। आज युवा दिवस के मौके पर हम बात कर रहे हैं पदेवा गांव निवासी अजय सैनी की, जिसने करौली में ना केवल स्वयं नर्सरी व्यवसाय को विकसित किया, बल्कि अन्य नर्सरियों को विकसित करने में भी योगदान दिया।

दसवीं कक्षा तक उत्तीर्ण अजय ने वर्ष 1998 में नर्सरी की शुरूआत की। 1600 रुपए की लागत के साथ नर्सरी का व्यवसाय शुरू किया, पहले ही वर्ष में उससे खासी आमदनी मिली, तो फिर अजय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेहनत-लगन के साथ साल दर साल वह नर्सरी को विकसित करता गया और आज स्थिति यह है कि प्रतिवर्ष का टर्नओवर 30 से 35 लाख रुपए हैं।

आर्थिक स्थिति नहीं थी अच्छी
अजय बताता है कि उस दौर में परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। यही वजह रही कि दसवीं के बाद वह आगे पढ़ाई नहीं कर सका। पिता एक संस्थान में काम करते थे, लेकिन वह बंद हो गया। इससे मुश्किल बढ़ गई। पिता परिवार को लेकर रोजगार के लिए दिल्ली चले गए। करीब एक दशक बाद वापस लौटे और उसी दौरान पिता मोहरसिंह सैनी के सहयोग से नर्सरी की शुरूआत की। 1600 रुपए की लागत के साथ पौधों की दो क्यारियां (दो हजार पौधे) तैयार की तो उसमें मुनाफा हुआ। इसके बाद व्यवसाय को आगे बढ़ाता गया। अजय के अनुसार पिछले वर्षों में उनके द्वारा करौली के अलावा हिण्डौन, गंगापुरसिटी, सिकंदरा आदि शहरों में घरों-मैरिज गार्डनों में कई बगीचे विकसित किए गए हैं। वहीं उनकी नर्सरी की तर्ज पर करौली में आधा दर्जन से अधिक नर्सरियां विकसित हुई हैं।

शहरों से मंगाते और खुद भी तैयार करते
वर्तमान में लम्बे-चौड़े परिसर में नर्सरी में हाईब्रिड किस्म के फलदार, फूलदार, छायादार , सजावटी आदि पौधे पनप रहे हैं, जिनकी बिक्री ना केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि कैलामाता के दरबार में आने वाले दूसरे शहरों के लोग खूब लेकर जाते हैं। अजय के अनुसार पहले बाहर से कुछ पौधे लाकर उन्हें बेचता था, लेकिन अब तो प्रतिवर्ष वे खुद करीब दो लाख पौधे तैयार करते हैं, जबकि पूणे, हैदराबाद और कलकत्ता से ट्रकों से भी अलग-अलग किस्मों के पौधे मंगाते हैं। जबकि यहां से मांग के अनुसार अजय हिण्डौन, लालसोट, गंगापुरसिटी आदि स्थानों तक थोक में पौधे भेजते हैं।

मेहनत भी खूब
अजय के अनुसार नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए मेहनत भी खूब करनी पड़ती है। समय पर पानी देना, पन्नी-मिट्टी बदलना, मौसम से बचाव करना आदि को लेकर मेहनत करनी होती है। इस ओर ध्यान नहीं देने पर पौधे नष्ट भी हो जाते हैं। स्वयं मेहनत करने के साथ अब नर्सरी के कामकाज के लिए चार स्थायी श्रमिक व सीजन में अन्य 7-8 श्रमिक भी लगाने पड़ते हैं।

गमलों की भी शुरूआत
नर्सरी के साथ ही पिछले वर्षों में अजय ने गमला व्यवसाय भी शुरू कर दिया। इन गमलों को पौधों के साथ और खाली बेचा जाता है। खुद सीमेंट के गमले तैयार कराता है, जबकि प्लास्टिक के गमले दूसरे शहरों से लाए जाते हंै।

Dinesh sharma Reporting
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