हौंसला बनीं शहादत की यादेंं, लोरियों में सुनाई पति की वीर गाथा

- वीरांगना उर्मिला ने जीवटता से की बेटे की परवरिश
-करगिल युद्ध में शहीद हुए थे हीरासिंह

By: Anil dattatrey

Updated: 26 Jul 2021, 11:29 AM IST


हिण्डौनसिटी. पूरे बाईस बर्ष हो गए हीरासिंह की शहादत को। घर की दीवारों पर सेना की वर्दी में टंगी तस्वीरें आज भी याद को ताजा किए हुए हैं। उस समय चंद्रशेखर महज सात महीने का था। जब करगिल युद्ध में देश के लिए बलिदान हुए पिता हीरासिंह पुरवंशी की पार्थिव देह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लिपट गांव मुकंदपुरा में घर पहुंंंची। एक बारगी को कलेजा फट पड़ा की कैसे कटेगा पहाड़ जीवन। लेकिन पति की शहादत की यादें वीरांगना उर्मिला देवी का हौसला बनीं जिन्होंने कभी टूटने नहीं दिया। शहादत की वीर गाथा की लोरियां से नन्हे से बच्चे को जीवटता से पाला पोशा। युवा हुआ 22 वर्षीय पुत्र शहीद पैकेज में मिली नौकरी से राजकीय सेवा में है।


वीरांगना उमिला देवी बताया कि पति की शहादत के करीब एक वर्ष बाद वह हिण्डौन आ गई। सरकार से मिली मदद से महवा रोड पर आवास बनवा कर पुत्र चंद्रशेखर की परवरिश मे जुट गई। उस समय सात हजार हजार रुपए की पेंशन राशि में घर खर्च और पढ़ाई का खर्च उठाया। घर के पास स्थिति सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में प्रारंभिक पढ़ाई कर 20 वर्ष में चंद्रशेखर स्नातक हो गया। इस दौरान दिसम्बर 2018 में उसे शहीद पैकेज से जिला मुख्यालय करौली पर जिला कोषागार में लिपिक संवर्ग में सरकारी नौकरी मिल गई। वीरांगना मां के उत्साहवद्र्धन से सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी चंद्रशेखर की पढ़ाई जारी रखे हुए है। इस वर्ष स्वयंपाठी छात्र के तौर राजनीति विज्ञान में एमए उत्तराद्र्ध की परीक्षा में शामिल होगा।


टाइगर हिल पर बलिदान हुआ था हिण्डौन का 'हीरा'
भारतीय सेना की 4- जाट रेजीमेंट का जाबांज हीरासिंह करगिल में टाइगर हिल को दुश्मन से मुक्त कराते हुए 21 जून 1999 को शहीद हुआ था। मुकंदपुरा गांव के सपूत की जांबाजी को आज भी परिजन व साथी सैनिक याद करते हैं। परिजनों ने बताया कि करगिल की पहाडिय़ों को दुश्मन से मुक्त कराने के लिए 4-जाट रेजीमेंट की टोली से आगे बढ़ हीरसिंह घुसपैठियों से भिड़ गया। उसने व साथियों घुसपैठियों को ढेर कर चौकी को तबाह कर दिया। ऑपरेशन में टोली की फ्रन्टलाइन ड्यूटी पूरी होने को थी, लेकिन इसी जोश में आगे बढ़ते हुए10 से अधिक घुसपैठियों को ढेर कर दिया और खुद की देश रक्षा करते हुए बलिदान हो गए।

बडा भाई भी करगिल युद्ध का सैनिक
शहीद हीरासिंह का बड़ा भाई भूपन सिंह ऑपरेशन करगिल विजय का सैनिक रहा है। भूपन सिंह ने बताया कि वे 8-जाट रेजीमेंट की टोली के साथ करगिल युद्ध में शामिल हुए। युद्ध के दौरान उन्होंने साइड लाइन पर नंदी टेकरी के पहाडियों से फायरिंग की। भूपन ने बनाया कि हीरासिंह उनसे प्रेरित हो सेना में भर्ती हुआ था।

शहादत की याद में सड़क और स्कूल को दिया नाम-
राज्य सरकार ने भी हीरासिंह की शहादत को चिर स्मरणीय बनाने के लिए मुकंदुपुरा के राजकीय माध्यमिक विद्यालय का नामकरण शहीद के नाम कर दिया। वहीं मुकंदपुरा के रास्ते का नाम शहीद हीरासिंह मार्ग किया गया। बयाना मोड पर इसका ***** भी लगाया हुआ है।

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