विलायत में रहकर भी गांव की माटी से नाता

Relationship with the soil of the village even after living inforeign

दानालपुर गांव के विकास में नवाचारों से बनाई पहचान

विदेश से लौट सामाजिक सराकारों से जुडे इंजीनियर मोहरूलाल मीणा

By: Anil dattatrey

Published: 15 Sep 2021, 11:11 PM IST

हिण्डौनसिटी/ पटोंदा.
कहते हैं गांव की मिट्टी से लगाव छूटे नहीं छूटता है। दूर रहने के बाद भी कुछ करने की तमन्ना फिर से अपनों के बीच ले आती है। विदेश में वर्षों रह कर लाटे एक इंजीनियर ने दिल में बसी गांव के सूरत और सवारने के लिए मुहिम छेड़ दी। पौधे रोपने से शुरू हुई जागरुकता की अलख और प्रयासों से गांव का साढ़े चार दशक पुराना एनीकट निर्माण का सपना साकार हो गया। दो दशक मध्य-पूर्व के देशों में मल्टीनेशनल कम्पनियों में प्रोजेक्टर डायेक्टर रहे वर्ष 1983 के आईआइटियन इंजीनियर मोहरूलाल मीणा अपने गांव दालानपुर में नवाचार करने में जुटे हैं।


विदेश से लौटने के बाद इंजीनियर मोहरू मीणा भतीजे कैग के वरिष्ठ मंडल लेखाधिकारी ताराचंद मीणा के साथ गांव को 80 के दशक जैसा हरभरा और सरसब्ज बनने की मुहिम में जुड़ गए। जागरुकता के लिए उन्होंने ग्रामीणों की बैठक प्रेरित किया। ऐसे में वर्ष 2016 में गांव के युवाओं ने वन महोत्सव मना कर पौधे रोपे। इस दौरान मोहरूलाल मीणा व ताराचंद मीणा ने गिरते भूजल स्तर को मुहिम में शामिल कर लिया। और पांचना बांध बनने के बाद सूखी गंभीर नदी के पेटे में एनिकट निर्माण का बीड़ा उठाया है।

45 वर्ष पुरानी मांग को मंजिल तक पहुंचाने के लिए इंजीनियर मोहरू और लेखाअधिकारी ताराचंद के प्रयासों से गंभीर नदी के तटवर्ती गांवों में ग्रामीणों की बैठक ले वर्ष 2016 में एनीकट के लिए देव बाबा का स्थान तय हो सका। लेकिन तकनीकि बाधाएं आडे आ गई। मोहरू व ताराचंद करीब चार वर्ष के प्रयासों से गंभीर नदी के पेटे में एनीकट निर्माण को हरीझंडी दिलाने में सफल हो गए। वर्ष 2020 में सरकार से स्वीकृत 3.80 करोड़ रुपए का एनीकट बन गया और गत 20 अप्रेल के पांचना बांध से पानी आने पर ग्रामीणों ने जल पूजन भी किया गया।

खुद के खर्चे पर बनाई एनीकट ड्राइंग-
इंजीनियर मोहरू मीणा ने बताया कि घना पक्षी अभयारण, पर्यावरण सहित कई वाधाएं होने से गंभीर नदी पर एनीकट के निर्माण अटका था। तकनीकि खामियोंं को दूर करने लिए उन्होंने ताराचंद मीणा ने स्वयं के खर्चे पर लम्बी प्रक्रिया पूरी कर गाइडलाइन के अनुसार एनीकट की ड्राईंग बनवा जनप्रतिनिधियों के सहयोग से जलसंसाधन विभाग के समक्ष प्रस्तुत की। जिसे विभाग ने अनुमोदित कर अन्य एनीकटों के लिए रोल मॉडल के रूप में शामिल कर लिया।

मेधावियों को घोषित किए पुरस्कार-
गांव के सरकारी स्कूल के प्रति रुझान के लिए इंजीनियर मोहरूलाल मीणा बोर्ड परीक्षा मेें अव्वल रहने वाले मेधावियों को नकद पुरस्कार देते है। वर्ष 2016 में उन्होने स्वयं के नाम से इंजीनियर मोहरू पुरस्कार शुरू किया है। जिसमें हर बर्ष कक्षा 10 व कक्षा 12 के प्रथम पांच छात्र-छात्राओं को 2500 रुपए की पुरस्कार राशि दी जाती है। इससे स्कूल में छात्र संख्या में इजाफा हुआ।

गांव में की स्कूली पढाई, दिल्ली से बने आईआईटियन
वर्ष 1960 में एक किसान परिवार में पिता गिल्लूराम व मां रामप्यारी के घर जन्मे मोहरु मीणा की प्रारंभिक शिक्षा दानालपुर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में हुई। पढ़ाई में कुशाग्र होने से वर्ष 1977 में मैथ्स साइंस वर्ग से कक्षा 10 की परीक्षा में श्रीमहावीरजी का राजकीय माध्यमिक विद्यालय टॉप किया। उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई के लिए माता पिता ने उन्हें जयपुर के श्री दिगम्बर जैन विद्यालय सी स्कीम जयपुर में पढऩे भेजा। मोहरू बताते हैं कि हायर सैकंडरी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के साथ ही वे वर्ष 1978 में संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई ) से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में प्रवेश लिया। जहां से इलैक्ट्रोनिक्स से पांच वर्षीय बी.टैक की उपाधि ली।

एअर इंडिया की नौकरी छोड़ गए विदेश-
इंजीनियर मोहरु मीणा बताते हैं कि वर्ष 1983 में बी.टैक की डिग्री के बाद एअर इंडिया में अधिकारी के चयनित हो गए। 10 वर्ष की नौकरी में मुम्बई एअरपोर्ट के डिप्टी मैनेजर रहे। बाद में एअर इंडिया की सेवा छोड़ मल्टीनेशन टेलीकॉम कम्पनी ज्वाईन कर विदेश चले गए। जहां वे मध्य-पूर्व एशिया के दुबई, कतर, ओमान, कुवैत, साउदि अरब, घना, जॉर्डन, इजिप्ट सहित अनेक देशों में टेलीकॉम कम्पनियों में सीनियर प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे।

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