करौली में लकड़ी की वस्तुओं के धंधे ने तोड़ा दम, प्लास्टिक और चीनी आइटमों का बढ़ा चलन

करौली में लकड़ी की वस्तुओं के धंधे ने तोड़ा दम, प्लास्टिक और चीनी आइटमों का बढ़ा चलन
करौली। खिलौने सहित विभिन्न प्रकार के लकड़ी के सामानों को लेकर करौली की पहचान रही है। चार दशक पहले तक लकड़ी की वस्तुओं बनाने में सैंकड़ों लोगों को रोजगार मिला था जिससे काम कुटीर उद्योग के रूप में सरसब्ज था। प्लास्टिक का दौर शुरू होने और चीन के खिलौनों कुटीर उद्योग ने यहां दम तोड़ डाला। सरकार से भी इस उद्योग में जुटे कारीगरों को संरक्षण मिला नहीं। अब इस कुटीर उद्योग के करौली में अवशेष शेष रह गए हैं।

By: Surendra

Published: 30 Aug 2020, 07:31 PM IST

करौली में लकड़ी की वस्तुओं के धंधे ने तोड़ा दम
करौली का लकड़ी का सामान रहा है प्रसिद्ध
प्लास्टिक और चीनी आइटमों का बढ़ा चलन
कारीगरों को नहीं मिला सरकार की ओर से सम्बल
करौली। खिलौने सहित विभिन्न प्रकार के लकड़ी के सामानों को लेकर करौली की पहचान रही है। चार दशक पहले तक लकड़ी की वस्तुओं बनाने में सैंकड़ों लोगों को रोजगार मिला था जिससे लकड़ी के सामान बनाने का काम कुटीर उद्योग के रूप में सरसब्ज था। प्लास्टिक का दौर शुरू होने और चीन के खिलौनों के बाजार में आने से इस कुटीर उद्योग ने यहां दम तोड़ डाला। सरकार की ओर से भी इस उद्योग में जुटे कारीगरों को संरक्षण मिला नहीं। अब इस कुटीर उद्योग के करौली में अवशेष शेष रह गए हैं।
रियासत काल से ही यहां लकड़ी की निर्मित वस्तुओं का खासा चलन रहा। यहां के लोग सौगात (गिफ्ट) के रूप में लकड़ी का सामान अपने रिश्तेदारों व परिचितों के लिए बाहर भेजते थे। यहां आने वाले लोग भी लकड़ी की वस्तुएं ले जाना नहीं भूलते थे। विशेष तौर पर कैलादेवी के मेले तथा करौली के फागुन के मेले में लकड़ी की वस्तुओं की खूब बिक्री होती थी। किसी घर में बच्चे के जन्म होने, राखी, भाई दौज आदि मौकों पर लकड़ी के खिलौनों के गिफ्ट में देने की परम्परा यहां रही है। यहां पर लकड़ी के शतरंज के मौहरे, चौपड़ की गोटी, फिरकिनी, किर्र, चील गाड़ी हाथ गाड़ी आदि विभिन्न प्रकार के खिलौने बनाकर बेचे जाते थे। पहले बच्चों की साइकिल नहीं थी, लकड़ी की गाड़ी में ही छोटे बच्चे बैठकर खेलते थे और हाथ गाड़ी के सहारे से कदम बढ़ाना सीखते थे। घर में दैनिक उपयोग की वस्तुओं में चकला-बेलन, हुक्का, लस्सी व छाछ बनाने को बिलौनी सहित अनेक तरह के सामान बनाए जाते थे। प्लास्टिक के चलन के साथ लकड़ी के सामान की मांग कम होती चली गई। फिर चीन के आए सामान ने तो इस उद्योग का दम ही निकाल दिया है। हालांकि लकड़ी के सामान की बिक्री भी होती है लेकिन काफी कम। अब अधिकांश लोग घरों में सजावट के लिए के लिए लकड़ी का सामान पसंद करते हैं।

नहीं मिला सरकार से संरक्षण
चार-पांच दशक पहले तक लकड़ी के सामान बनाने और बेचने के लिए करौली में अलग से हटवाड़ा बाजार था। इस बाजार में लगभग 100 परिवारों के सैंकड़ों लोग इस लकड़ी के सामान को तैयार करने से रोजगार पा रहे थे। अब इनकी संख्या काफी कम रह गई है। असल में सरकार से भी इस उद्योग को संरक्षण नहीं मिल सका। न तो सरकार इस धंधे से जुड़े लोगों को जंगल से लकड़ी लाने के लिए अनुज्ञापत्र जारी किए और न मशीन लगाने के लिए ऋण की व्यवस्था की।

करते नहीं आवेदन
लकड़ी के अधिकांश कारीगर कम शिक्षित हैं। इसलिए वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते हैं। सरकारी प्रक्रियाओं की उलझनों के कारण ज्यादातर ने अपने काम को बढ़ाने या आधुनिक संसाधनों का इसमें प्रयोग करने के लिए सरकारी मदद नहीं ली है।


ऋण उपलब्ध है
लकड़ी की वस्तुओं के व्यवसाय या लकड़ी के कुटीर उद्योग संचालित करने वाले सदस्य सरकार की योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं। उनको बैंकों से सस्ती दर से ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है जिससे वे अपने कारोबार को और बढ़ा सके। उद्योग केन्द्रों पर इस बारे में परामर्श भी दिया जाता है और शिविर भी लगाए जाते हैं।
कमलेश मीणा, महाप्रबंधक , जिला उद्योग केन्द्र करौली।

क्या कहते हैं कारीगर
हमारा पूरा परिवार लकड़ी के तरह-तरह के खिलौने बनाने का काम करते थे। दो दशक पहले तक बहुत अच्छी बिक्री होती थी। सरकार ने पेड़ों की लकड़ी पर सख्ती से पाबंदी लगा दी। एक ओर लकड़ी की कमी हुई तो दूसरी ओर मांग भी घट गई। इससे धंधा चौपट हो गया। पूरा परिवार बिखर गया। कोई मजदूरी, कोई पुताई करने के काम में लग गया। लकड़ी के परमिट की बहुत कोशिश की लेकिन नहीं मिला। सरकार ने हमारी कोई सुनवाई की।
मोहम्मद इब्राहिम शेख, हटवाड़ा करौली

चाइना और प्लास्टिक के खिलौने आ जाने से रोजी- रोटी का संकट हो गया। अब केवल चकला बेलन बनाने से अपने परिवार को पाल रहे हैं। सरकार से हमें कोई मदद नहीं मिली।
महमूदा, ब्राह्मण धर्मशाला के पीछे करौली

लकड़ी के सामान की कभी अच्छी बिक्री होती थी। प्लास्टिक की वस्तु तथा चाइना के खिलौने ने हमारे धंधे को चौपट कर डाला। अब धंधा छोटे-मोटे लकड़ी के काम करके परिवार को पाल रहे हैं।
कमरुद्दीन, ब्राह्मण धर्मशाला के पास करौली

पहले हम हाथ से लकड़ी के खिलौने बनाने का काम करते थे। अब मशीन का जमाना आ गया। पैसा नहीं होने से मशीन नहीं लगा पाए। लकड़ी का भी संकट रहा है। प्लास्टिक के चाइना के खिलौनों के कारण लकड़ी के खिलौने अब बाजार में बिकना भी बंद हो गए। अब तो केवल लकड़ी के काम की मजदूरी करके पेट भरते हैं।
अब्दुल गफ्फार हटवाड़ा करौली
बचपन से हम लकड़ी का सामान बनाने का काम कर रहे हैं। पहले हम लकड़ी के खिलौने जैसे ट्रैक्टर ट्रॉली, हवाई जहाज, कमल का फूल, चार पहिया की गाड़ी जैसे कई तरह के खिलौने बनाते थे। राखी, भ
इया दौज आदि पर काफी बिक्री होती थी। अब बाहर के खिलौनों ने धंधा चौपट कर डाला है। हमने सरकार से कई बार मदद की गुहार की पर कोई सुनवाई नहीं हुई
मौला बख्स, हटवाड़ा, करौली

Surendra Bureau Incharge
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