सृष्टि का उद्गम स्थल है सोरों, रामनवमी को दूध बन जाता है सूर्यकुंड का पानी

सृष्टि का उद्गम स्थल है सोरों, रामनवमी को दूध बन जाता है सूर्यकुंड का पानी
Soron

Dhirendra yadav | Publish: Sep, 15 2019 10:06:34 AM (IST) | Updated: Sep, 15 2019 10:53:12 AM (IST) Kasganj, Kasganj, Uttar Pradesh, India

विष्णु ने हिरण्याक्ष दैत्य का वध करने के लिए शूकर के रूप में अवतार लिया
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष ग्यारस को सदियों से लगता आ रहा है मेला
सूर्यकुंड के पानी में खीर बनाकर खाते हैं श्रद्धालु, जिसे माना जाता है अमृत
भगवान वाराह का मंदिर, सीता रसोई, तुलसी दास की ससुराल सोरों में ही
60 हजार साल पहले सूर्यकुंड पर सूर्य देव ने की थी तपस्या
हड़गंगा में घुल जाती हैं हड्डियां, प्रयाग में अक्षय वट तो सोरों में सिद्धि वट

कासगंज। हिरण्याक्ष दैत्य बड़ा ही बलवान था। देवताओं पर चढ़ाई करके देवताओं को जीत लिया। लोकों का अधिपति बनकर बैठ गया। देवता छिप गये। भगवान विष्णु की आराधना करने लगे। तब भगवान वाराह का रूप धारण इसी शूकर क्षेत्र में ब्रह्माजी की नासिका से प्रकट हुए। भगवान वारह ने पाताल में जाकर दैत्य से युद्ध कर उसका वध किया। पृथ्वी का भार हरण किया। भगवान अपने अवतार का उद्देश्य पूरा करने के बाद निज देह का परित्याग इसी सोरों शूकर पुण्य क्षेत्र में किया। इसी कारण मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष ग्यारस को सदियों से मेला लगता आ रहा है। यहीं पर विष्णु के अवतार भगवान वाराह का मंदिर है। सीता की रसोई है, जिसके बार में मान्यता है कि सीता जी ने यहां भोजन पकाया था। सूर्य कुंड है, जिसके पानी से खीर बनाने की परंपरा है। तुलसीदास की ससुराल है, जहां सांप को रस्सी समझकर छत पर चढ़ गए थे। धर्म क्षेत्र के जानकारों के अनुसार सृष्टि का उद्गम स्थल सोरों तीर्थनगरी को ही माना जाता है।

भगवान सूर्य ने की थी तपस्या
जनपद कासगंज का शूकर (सूकर) क्षेत्र सोरों पूर्व में वाराह क्षेत्र के रूप में प्रचलित था। सोलंकी वंश के शासकों ने इसका नामकरण सूकर क्षेत्र सोरों के रूप में किया, तभी से यह क्षेत्र शूकर क्षेत्र सोरों के नाम से अपनी पहचान बनाये हुए है। भगवान वाराह की जन्मस्थली सोरों में हरि की पौंडी सूरज कुंड, भागीरथी गुफा, डॉ. हरिदास पाठशाला समेत अनेक पौराणिक स्थल विद्यमान हैं। मां गंगा मंदिर के महंत कालीचरन माफीदार ने शूकर क्षेत्र सोरों की विशेषता बताते हुए कहा कि यहां स्थित सूर्यकुंड पर तकरीबन 60 हजार वर्ष पूर्व भगवान सूर्य ने तपस्या की थी। दुनिया में चार प्रकार के वट वृक्ष शास्त्रों में वर्णित हैं, जिसमें अक्षय वट प्रयागराज में है, तो वहीं सोरों के लहरा रोड पर सिद्धि वट है। उन्होंने कहा कि शूकर क्षेत्र सोरों भारत भूमि का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।

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मोक्षदा एकादशी को वध किया
सोरों के तीर्थ पुरोहित कन्हैया लाल त्रिवेदी ने बताया कि पृथ्वी को पाताल लोक ले जाने वाले दैत्यराज हिरण्याक्ष का मोक्षदा एकादशी को वध करके द्वादशी को भगवान वाराह ने हरि की पौड़ी में मोझ की प्राप्ति की, तभी से मेला मार्गशीर्ष लगता है। सोरों हरपदीय गंगाकुंड हरि की पौड़ी में जो अस्थियां विसर्जित की जाती हैं, वो 72 घंटे के अंदर पानी में घुल मिल जाती हैं। यही कारण है कि लोग यहां अस्थियां विसर्सिजत करने आते हैं ताकि मृतक को मोक्ष मिल सके।

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पानी बन जाता है दूध
समाजसेवी नम्रता त्रिवेदी के मुताबिक तीर्थनगरी में हरि की पौड़ी, भागीरथी, गुफा के अलावा बहुचर्चित सूर्यकुंड है। इसी सूर्यकुंड में 60 हजार वर्ष पूर्व सूर्य भगवान ने तपस्या की थी, तभी से इस कुंड में रामनवमी के दिन पानी दूध की तरह हो जाता है, लोग इसकी खीर बनाकर खाते है, जिसे अमृत सामान माना जाता है।

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उपेक्षा का शिकार
नरेश त्रिगुणायक ने बताया कि सोरों शूकर क्षेत्र भारत वर्ष का एक आदि तीर्थक्षेत्र है, लेकिन सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। सोरों को तीर्थस्थल और पर्यटल स्थल घोषित करने की मांग वैसे तो एक लम्बे समय से चली आ रही है, लेकिन सोरों के विकास की यह मांग भी राजनीति का शिकार होकर नक्कारखाने में तूती की तरह दबकर रह जाती है। इसके चलते यह आदि तीर्थस्थल सूकर क्षेत्र पिछड़ा व उपेक्षित बना हुआ है।

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कैसे पहुंचें
कासगंज जिले से 16 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश का विख्यात तीर्थ स्थल सोरों सूकर क्षेत्र है। यहां पहुंचने के लिए बस और रेल मार्ग दोनों ही साधन हैं। तीर्थनगरी सोरों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु राजस्थान, मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आते हैं।
प्रस्तुतिः आर्येन्द्र यादव, कासगंज

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