इलेक्शन 2019 स्पेशल...दूसरे दौर के चुनाव में बिहार की इन सीटों पर मतदाताओं के सामने मोदी ही सबसे बड़ा मुद्दा

इलेक्शन 2019 स्पेशल...दूसरे दौर के चुनाव में बिहार की इन सीटों पर मतदाताओं के सामने मोदी ही सबसे बड़ा मुद्दा

Prateek Saini | Publish: Apr, 17 2019 03:03:40 PM (IST) | Updated: Apr, 17 2019 03:03:41 PM (IST) Katihar, Katihar, Bihar, India

विशेष संवाददाता प्रियरंजन भारती की रिपोर्ट...

 

(पटना, कटिहार): दूसरे दौर में जिन पांच सीटों के मतदान हैं उनमें तीन सीमावर्ती और दो पूर्वी बिहार की सीटें हैं। सीमांचल क्षेत्र में पूर्णियां, कटिहार और किशनगंज जबकि पूर्वी बिहार की दो सीटें भागलपुर और बांका हैं। पूर्णियां जदयू की जीती हुई है जबकि किशनगंज और कटिहार कांग्रेस की सीट है। खास बात यह है कि इस दौर के मतदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही मुद्दा हैं। मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने और नहीं बनने देने के आधार पर ही मतदाताओं का ध्रुवीकरण है। इन दो पाटों के बीच ही जातीय गोलबंदी समाहित है।


सीमांचल की किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी सत्तर फीसदी है और यह इलाका बांग्लादेश से सटा हुआ है। यहां कांग्रेस के डॉ मोहम्मद जावेद और जदयू से महमूद अशरफ के बीच मुकाबले को एमआइएम के अख्तरुल ईमान ने तिकोना बनाने की परस्थिति बना दी है। पूर्वी भारत को सड़क और रेल मार्ग से जोड़ने वाले किशनगंज में इस बार परिस्थिति थोड़ी बदली है।2014 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रही भाजपा तब अकेली थी और अख्तरुल ईमान जदयू के प्रत्याशी रहते हूए चुनाव से भाग गए थे। अब जदयू को भाजपा का साथ है और दो बार सांसद रहे अशरारूल हक़ की जगह कांग्रेस के महमूद अशरफ को अख्तरुल ईमान से भी मुकाबला करना पड़ रहा है। इस तिकोनी लड़ाई में जदयू को हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोटों के विभाजन का लाभ मिल सकता है।


कटिहार में तारिक अनवर को जदयू के दुलालचंद गोस्वामी जैसे स्थानीय उम्मीदवार से लड़ने का लाभ संभव है। यहां की जंग तारिक अनवर और भाजपा के निखिल चौधरी में होती रही और दोनों ही कई चुनाव हारे जीते। लेकिन इस बार जदयू को यह सीट शेयरिंग में मिली और उसने विधानसभा चुनाव हारे हुए प्रत्याशी को उम्मीदवार बना दिया। कटिहार बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ सियासी विरोध का चर्चित अखाड़ा रहा है।


पूर्णियां है तो जदयू के खाते की सीट लेकिन भाजपा के टिकट पर पिछला चुनाव जदयू के संतोष कुशवाहा से हारे हुए उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह इस बार कुशवाहा को कांग्रेस उम्मीदवार बनकर कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इसके नतीजे कुछ भी संभव हैं। भागलपुर जैसी रेशमनगरी में गंगोता कुर्मी विरादरी, मुस्लिम, मारवाड़ी और ब्राम्हण वोट ही निर्णायक हैं। जदयू ने आरजेडी सांसद शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल के खिलाफ अजय मंडल को उतारा है। चुनाव में तीसरा कोण भाजपा कार्यकर्ताओं की उदासीनता, भीतरघात और निष्कृयता का है जो प्रभावी साबित हो सकता है।


भागलपुर सीट भाजपा के शाहनवाज हुसैन से छीनकर जदयू को दे दी गई है। बांका में नीतीश कुमार की जिद ने दिग्विजय सिंह की पत्नी पूर्व सांसद पुतुल कुमारी को भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने पर न केवल विवश कर दिया बल्कि लड़ाई को तिकोना और निर्णायक बनवा डाला है। पुतुल इस पोजिशन में हैं कि वह या तो वोटों का विभाजन खूब हो जाने की सूरत में खुद जीत जाएं या फिर आरजेडी के एमवाई समीकरण के थोड़ा अधिक भारी हो जाने पर जदयू के गिरिधारी यादव को शिकस्त की सीमा तक पहुंचा डालें।

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