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7988 बच्चों को ‘मौत ने निगला’, जिले में हर दिन हो रही बच्चों की मौत, उजड़ रही गोद

locationकटनीPublished: Jan 05, 2024 09:49:40 pm

Submitted by:

balmeek pandey

जिला अस्पताल के एसएनसीइयू हर दूसरे दिन हो रही एक से दो बच्चे की मौत, तीन साल में 677 बच्चों ने तोड़ा दम, बीमारी व बेपरवाही जन पर पड़ रही भारी

7988 बच्चों को ‘मौत ने निगला’, जिले में हर दिन हो रही तीन बच्चों की मौत, उजड़ रही गोद
7988 बच्चों को ‘मौत ने निगला’, जिले में हर दिन हो रही तीन बच्चों की मौत, उजड़ रही गोद

कटनी. नौ माह तक सैकड़ों कष्ट सहते हुए बच्चे को मां कोख में रखती है। परिवार में आने वाले मेहमान को लेकर खुशियां बांटने की बड़ी तैयारी होती है, लेकिन बच्चे को जनने के बाद मां अपने लाल का मुंह तक नहीं देख पाती। बच्चे भी जन्म लेकर असमय कालकलतिव हो जा रहे हैं। जिले में औसतन हर दो से तीन बच्चों की मौत हो रही है। जिला अस्पताल में हर दूसरे दिन एक बच्चा दम तोड़ रहा है। बेहतर व्यवस्था और डॉक्टरों द्वारा देखरेख किए जाने के दावे के बीच हकीकत चौकाने वाली है। जिले में पिछले 10 सालों में 7 हजार 988 बच्चे काल कलवित हो गए हैं।
जिले के एसएनसीइयू में तीन साल में बच्चों के मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। जिला अस्पताल के सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीइयू) में एक साल में चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 1 अप्रेल से अभी जिला अस्पताल में 265 बच्चों ने दम तोड़ दिया है। पिछले तीन साल में 677 बच्चों ने दम तोड़ा है। इन बच्चों के मौत की वजह एक्सपीजियर, सेप्सिस, मैनेजाइटिस संक्रमण के साथ प्रि-मिच्योर डिलेवरी प्रमुख वजह बताई जा रही है। करोड़ों रुपए की यूनिट, लाखों रुपए के चिकित्सक व कर्मचारी, स्वास्थ्य सहित महिला बाल विकास द्वारा हर माह लाखों रुपए से पोषण के दावे कमजोर साबित हो रहे हैं। महिलाएं भी सुरक्षित नहीं हैं। इस साल में अबतक 55 गर्भवती व प्रसूताओं ने दम तोड़ दिया है।

इस तरह हो रही मौतें
जिले में मासूमों की मौत चिंताजनक है। स्वास्थ्य विभाग आंकड़ों की बाजीगरी में भले ही अपने आप को बेहतर मान रहा हो, लेकिन जिस घर के बच्चे की मौत होती है, शायद उसका दुखड़ा वहीं जानते हैं। नौ माह में प्रसव के 24 घंटे के अंदर 34, प्रसव से एक सप्ताह के अंदर 47, 28 दिन में 20, एक माह तक के अंदर में 34, प्रसव के बाद एक से 12 माह के अंदर 75, एक साल से 5 साल तक के अंदर 60 बच्चों ने दम तोड़ा है। जिले में एक अप्रेल से अबतक 633 बच्चों को मौत ने निगल लिया है। गर्भवती महिला व गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव रहता है। आंगनवाड़ी के माध्यम से मिलने वाले सही पौष्टिक आहार को न लेना, आयरन, कैल्सियम, विटामिन की कमी कारण बन रही है। घर के लोगों को महिला के स्वास्थ्य को लेकर जागरुक न होना भी है।

एसएनसीइयू की यह है रिपोर्ट
वर्ष मौतें
2023-24 265
2022-23 226
2021-22 186
2019-20 191
2019-18 168
2017-18 129

फैक्ट फाइल
- 20 से अधिक हैं एसएनसीयू में वॉर्मर, जिनमें बच्चों को रखकर बचाने किया जाता है प्रयास।
- 2 से तीन बच्चे कर दिए जाते हैं गंभीर होने पर रैफर, वेंटीलेटर की खलती है कमी।
- 15 से 20 महिलाएं प्रतिदिन पहुंचती हैं प्रसव के लिए, सीजन में 40 तक पहुंचता है आंकड़ा।
- 8 से 10 प्रसव कराए जाते हैं प्रतिदिन, सीजन में 25 से 30 महिलाएं देती हैं बच्चों को जन्म।
- 1 से 2 केस खून की कमी, हाईरिस्क, परिजनों द्वारा ब्लड आदि न दिए जाने सहित केयर न होने के कारण केस किए जाते हैं रैफर।

इन बिंदुओं पर करना होगा फोकस
गर्भवती महिलाओं की बेहतर देखभाल हो, ताकि बच्चा कमजोर पैदा न हो। भर्ती करने की बेहतर सुविधा ब्लॉक स्तर पर हो। प्रसव के 48 घंटे बाद सभी को घर भेज देते हैं, और ये दो किलो का बच्चा या तो घर में मर जाता या अस्पताल में, ठंड के मौसम में इन दो किलो के बच्चों को गर्म रखना पड़ता है। आंगनबाड़ी को मजबूत करते हुए आशाओं द्वारा घर-घर जाकर नवजात की देखभाल सुनिश्चित हो, इसका एक मॉनिटरिंग सिस्टम ठीक हो। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और उप स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर देखभाल हो। गर्भवती के परिजनों को भी जागरुक किया जाना चाहिए।


यह है मौत का आंकड़ा
वर्ष प्रसव बच्चों की मौत
2014-15 24105 471
2015-16 23009 607
2016-17 22418 561
2017-18 24342 954
2018-19 24366 998
2019-20 23923 1138
2020-21 23459 959
2021-22 20639 747
2022-23 24039 920

वर्जन
जिले में गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं सहित बच्चों की बेहतर देखभाल कराई जा रही है। व्यवस्था को और दुरुस्त किया जाएगा। कमियां को चिन्हित कर उन्हें दूर करेंगे। लापरवाही पर संबंधित के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. आरके अठया, सीएमएचओ।

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