73 साल से विकास की बाट जोहता मध्य प्रदेश का यह गांव

-साल के चार महीने टापू बना रहता है यह गांव
-ग्रामीणों का पुरसाहाल नहीं

By: Ajay Chaturvedi

Updated: 25 Aug 2020, 01:48 PM IST

कटनी. एक तरफ पूरे देश में विकास की चर्चा है। स्मार्ट सिटी ही नहीं स्मार्ट विलेज की कल्पना पर काम किया जा रहा है। लेकिन हकीकत इससे एकदम विपरीत है। आलम यह है कि आजादी के 73 साल बाद भी ऐसे कई इलाके हैं जहां विकास की किरण पहुंच ही नहीं सकी है। ऐसे इलाकों की कमी नहीं जो साल के चार महीने टापू बन जाते हैं। आम इंसान की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते तो रोगियों को अस्पताल तक पहुंचा पाना सबसे मुश्किल काम होता है। ऐसे ही इलाकों में एक है विजयराघवगढ़ का खिरबा खुर्द गांव।

अक्सर ये सुनने में आते है, समाचारों की सुर्खियां बनती हैं कि फलां गांव में आजादी के बाद अब तक बिजली कनेक्शन नहीं, पानी की पाइप लाइन नहीं। स्कूल और लाइब्रेरी तो बहुत दूर की बाद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं। मानसून सत्र में तो गांव के गांव ही टापू में तब्दील हो जाते हैं। ठीक ऐसे ही मध्य प्रदेश का यह इलाका भी है।

बता दें कि महानदी का पानी गांव के संपर्क मार्ग पर भर जाता है। लिहाजा वाहनों का आवागमन बंद हो जाता है। ऐसे में हादसा होने, वारदात होने या फिर ऐसी कोई भी संदिग्ध मौत जिसमें पोस्टमार्टम की आवश्यकता होती है उन सभी मृतकों के शवों को गांव से चार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए महानदी को नांव से पार कर पिपरा गांव तक आना पड़ता है। खिरबा खुर्द गांव में आपात स्थिति तक के लिए ऐसा कोई विकल्प नहीं है या बनाया नहीं गया है जिससे लोगों को राहत मुहैया कराई जा सके।

बारिश के मौसम में चौरतरफा संकट इलाके के लोगों की नियति बन कर रह गई है। बारिश का मौसम आते ही गांव के गांव कैद हो जाते हैं। इलाज के लिए भी पैदल आना-जाना पड़ता है। महिला को प्रसव पीड़ा हो या फिर बच्चों को पढ़ाई के लिए एक गांव से दूसरे गांव जाना हो। सभी को नदी पार करनी पड़ती है। कहें कि बारिश के दिनों में इस गांव में मुसीबतों की बरसात होती है तो अतिशयोक्ति न होगी। गांव के विकास के लिए वादे तो बहुत किए गए, लेकिन हकीकत में विकास हुआ नहीं।

कटनी जिले के विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र का खिरवा गांव आजादी के 73 साल बाद भी विकास की मुख्यधारा से काफी पीछे छूट गया है। बाणसागर के डूब क्षेत्र सहित यह गांव आया लेकिन विडंबना यह है कि डूब में आने के पहले शासन द्वारा सभी गांव को विस्थापित किया गया लेकिन इस गांव को छोड़ दिया गया। इस गांव के लोगों को खरीद फरोख्त करने बरही तक जाना होता है मगर वहां तक जाने के लिए भी नाव ही सहारा है। लोग बाइक को नाव में रखकर गांव के उसपर ले जाते हैं उसके बाद बाइक से आगे का सफर करते हैं। गांव में नाव भी एक ही है जिससे आने-जाने वालों को घंटों तक इंतजार करना पड़ता है।

इस संबंध में प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह मामला बाणसागर से जुड़ा था, इसलिए देर हुई है। जमीन बाणसागर की थी, इसलिए सड़क नहीं बनाई जा सकती थी। इन अड़चनों को दूर करते हुए सड़क स्वीकृत हो गई है। अब यह मामला आरईएस के पास है। आरईएस जल्द ही यहां पर सड़क निर्माण करेगी।

कोट
सड़क निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हो गई है।- प्रिया चंद्रावत एसडीएम विजयराघवगढ़

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