लॉकडाउन में नौकरीपेशा परिवार भुखमरी की कगार पर, शासन-प्रशासन बेखबर

-लॉकडाउन को होने आ रहे 50 दिन

By: Ajay Chaturvedi

Published: 10 May 2020, 04:46 PM IST

कटनी. कोरोना के चलते लॉकडाउन हुए धीरे-धीरे 50 दिन होने को आ रहे हैं। सरकार से लेकर तमाम सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक संगठनों का सारा ध्यान उस तबके की ओर है जिन्हें लॉकडाउन के पहले भी दो जून की रोटी जुटाना आसान न थी। तब भी वो रोटी के एक टुकड़े को आपस में बांट कर नमक से ही खा रहे थे। घर गृहस्थी कायदे से चले इसी खातिर तो वो परदेस गए थे। लेकिन उस तबके की ओर कम लोगों का ध्यान जा रहा है जो संम्मानजक जीवन बसर कर रहे थे। उन्हें घर खर्च के लिए किसी के आगे हाथ नहीं पसारना होता था। लेकिन अब इन 50 दिनो से घर में कैद ऐसे लोगों का संकट बड़ा होता जा रहा है। ये किसी से कुछ मांग सकते नहीं, कहीं कतार में लग नहीं सकते। पर जरूरत तो इन्हें भी है।

लॉकडाउऩ के चलते सब कुछ बंद है। चाहे वो निजी शिक्षण संस्थान हों या मल्टीनेशनल कंपनियां। ठेकेदारों के साथ करने वाले हों या इस जैसे तमाम एजेंसियों में। वो ज्यादा नहीं तो महीने के 10-12 हजार रुपये तो कमा ही लेते थे जिससे उनका घर खर्च जैसे तैसे चल जा रहा था। लेकिन इधरबीच सब बंद है। इनके लिए सरकार भी मौन है। कोई योजना ही नहीं है सरकार के पास ऐसे लोगों के बारे में।

ऐसे में अब ये भी उसी कतार में लगने को विवश हैं जहां पहले से ही पूरी फौज खड़ी है। अब ये भी किसी आश्रयदारा के रहमों करम पर निर्भर हैं। कुछ संस्थाओं ने ऐसे लोगों की पीड़ा को समझा जरूर है और वो इन परिवारों में कच्चा अनाज पहुंचा दे रहे हैं। लेकिन यह कितने दिन चलेगा। अब ऐसे लोगों के माथे पर शिकन साफ झलकने लगी है।

जानें इनकी परेशानी

- माई नदी के समीप एक परिवार के दो बच्चे निजी कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन से पहले ही घर आ गए। नौकरी और पूरा वेतन मिलने तक तो सब ठीक रहा। पर अब अनाज का संकट पैदा हो गया है।
-गायत्री नगर और एनकेजे में रहने वाले पुजारी के परिवार का खर्च मंदिर में पूजा से चलता था। अब मंदिर भी बंद हैं। ऐसे में दर्शनार्थियों का आना-जाना बंद है तो इनके लिए भी आजीविका का संकट है
- निजी स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका को 6 हजार रुपये महीना वेतन मिलता था। स्कूल बंद तो वेतन बंद। घर के कुछ कमरे किराये पर दिए थे, लेकिन किराया नहीं मिला। अब भूखे बैठे हैं, किसी से कुछ मांगने में शर्म आती है।

"निश्चित तौर पर जरूरतमंद परिवार आत्मसम्मान के साथ जीता है। मदद के दौरान ऐसे कई परिवार सामने आए। हमारी कोशिश रहती है कि उनके स्वाभिमान को चोट पहुंचाए बगैर ही मदद पहुंचा दी जाए।"- शशांक श्रीवास्तव, मेयर

Ajay Chaturvedi
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