सात दिनों तक इस जिले में हुई घनघोर बारिश, फिर स्वयं भगवान कृष्ण ने बजाई मुरली, रहस्य जानने जन्माष्टमी पर मंदिर में उमड़ी भीड़

सात दिनों तक इस जिले में हुई घनघोर बारिश, फिर स्वयं भगवान कृष्ण ने बजाई मुरली, रहस्य जानने जन्माष्टमी पर मंदिर में उमड़ी भीड़

Balmeek Pandey | Publish: Sep, 03 2018 05:32:46 PM (IST) | Updated: Sep, 03 2018 05:39:46 PM (IST) Katni, Madhya Pradesh, India

लघु वृंदावन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विविध आयोजन

कटनी. भगवान कृष्ण की भक्ति दो स्वरुप में की जाती है, बाल कृष्ण और योगेश्वर कृष्ण। सिर्फ ज्ञानीपुरुष को ही (जिन्हें आत्मज्ञान हुआ हो) कृष्ण भगवान की सही पहचान होती है, क्योंकि उनकी आत्म-जागृति कृष्ण भगवान की जागृति के समान होती हैं। ऐसे ज्ञानी कभी-कभार होते हैं। ज्ञानी पुरुष हर समय भगवान श्रीकृष्ण की लीला में गोतालगाकर गूढ़ रहस्य प्राप्त करते हैं। करें भी क्यों नहीं, क्योंकि उनकी लीलाओं से बड़े-बड़े देवता भी मोहित हुए हैं। द्वापर युग के साथ कलियुग में भी उनकी ऐसी-ऐसी लीलाएं चरितार्थ हो रहीं हैं जो लोगों को चकित कर रहीं हैं। ऐसा ही कुछ जीवंत उदाहरण है कटनी जिले के ग्राम बांधा इमलाज में। जहां पर विराजे कृष्ण कन्हैया की अनूठी कहानी चरितार्थ हो रही है। जिसे अब लोग लघु वृंदावन के नाम से जानते हैं। शानदार नक्कासी और पुरातन कलाकृति का नमूना जिले की रीठी तहसील का बांधा इमलाज राधा कृष्ण मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र है। लगभग 85 वर्ष पुराने मंदिर की नींव से लेकर गुम्बद तक के निर्माण में मात्र 15 हजार रुपए और 11 साल तक मालगुजारी में मिलने वाले अनाज का खर्चा आया था। बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर के निर्माण के दो वर्ष बाद सात दिनों तक जिले में लगातार बारिश का दौर चला था और उस दौरान कान्हा की मुरली की नाद लोगों को तीन दिन तक सुनने को मिली थी। तभी से चमत्कारिक मंदिर क्षेत्र को लोग लघु वृंदावन के नाम से पुकारते हैं। गांव के वयोवृद्ध पं. सीताराम मिश्रा ने बताया कि गांव के मालगुजार पं. गोरेलाल पाठक ने मंदिर की आधार शिला रखी थी लेकिन अल्प आयु में ही उनकी मृत्यु हो गई। जिसके बाद उनकी पत्नी भगौता देवी व पूना देवी ने उनके संकल्प को आगे बढ़ाने का काम किया।


ऐसे तैयार हुआ मंदिर
मंदिर समिति महेश पाठक ने बताया कि मालगुजार की पत्नियां भगवान श्रीकृष्ण को पुत्र व राधारानी को पुत्रवधु मानती थीं। जिसके चलते वर्ष 1915 में मंदिर का निर्माण प्रारंभ कराया गया, जो 9 वर्ष बाद 1924 में पूर्ण हुआ। दो वर्ष 1926 में मंदिर में प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। पाठक ने बताया कि उस दौरान मंदिर के निर्माण में 15 हजार रुपए और उसके साथ मालगुजार को गांव से मालगुजारी के रूप में मिलने वाला 11 साल का अनाज लगा था। बुजुर्गों ने बताया कि स्थापना के दो वर्ष बाद 1928 के भादों माह में सात दिन तक लगातार बारिश हुई थी और उस दौरान लोगों को तीन दिन व तीन रात बांसुरी की धुन सुनाई दी थी।

जन्माष्टमी पर उमड़ा सैलाब
मंदिर में साल भर पर्व के समय विविध आयोजन होते आ रहे हैं तो जन्माष्टमी पर्व पर सैकड़ों श्रद्धालुओं को हुजूम उमड़ता है। गांव के बुजुर्ग एपी चतुर्वेदी, रवि मिश्रा बताते हैं कि मंदिर के निर्माण में लगाए गए पत्थरों की नक्कासी और उन्हें आकर्षक रूप देने का कार्य बिलहरी के कलाकार बादल खान ने की थी। जिनकी कला को आज भी लोग सराहते हैं। इसके अलावा उनका सहयोग बिलहरी के सरजू बर्मन व भिम्मे नाम के कारीगरों ने किया था। बुजुर्गों ने बताया कि मंदिर में लगा पूरा पत्थर सैदा गांव से आया था और एक ही बैलगाड़ी से उनको ढोया गया। बुजुर्गों ने बताया कि मंदिर निर्माण कार्य पूरा होते ही बैलगाड़ी में जोते जाने वाले भैंसे ने मंदिर की सीढिय़ों में ही दम तोड़ दिया था।


अद्भुत है कृष्णलीला
काफी लोग सोचते हैं कि कृष्ण भगवान ने बहुत युद्ध किए। बहुत सारे लोगों को मार दिया, उनकी सोलह हजार रानियां थी, वे राजसी ऐश्वर्यवाला जीवन जी रहे थे, इत्यादि। ऐसी परिस्थिति में उन्हें कैसे भगवान माना जाए? पूरी दुनिया में लोग क्यों उनकी श्रद्धा से भक्ति करते हैं? वास्तव में भगवान (मतलब आत्मा) कृष्ण रुप में थे। दूसरे शब्दों में वे आत्म ज्ञानी थे। वे हमेशा निज स्वरुप की जागृति में रहते थे मैं शुद्धात्मा हूँ और ये देह अलग है। भौतिक रूप से संसार के हर कार्य में उपस्थित रहने के बावजूद कृष्ण भगवान हमेशा मैं किसी भी कार्य का कर्ता नहीं हूँ। उनकी हजारों रानियां थी और वे राजसी जीवन व्यतीत कर रहे थे फिर भी वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। उन्हें हमेशा ये लक्ष्य में रहता था कि वे कर्मों से भाग नहीं सकते और जागृति में रहकर कर्मफल को भुगतना ही सही तरीका है।

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