वाराणसी/कौशाम्बी. रणविजय निषाद ने जब कौशाम्बी जिले के कड़ा ब्लॉक अन्तर्गत कंथुवा गांव के प्राथमिक विद्यालय में नौकरी शुरू की तो वहां महज नौ बच्चे पढ़ने आते थे। यह उनकी आत्मा पर यह बोझ की तरह था कि जिस स्कूल में वह पढ़ाते हैं वहां महज नौ बच्चे आते हैं। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी। खुद गांव में जाकर बच्चों को स्कूल लाना शुरू किया। मेहनत रंग लायी और करीब डेढ़ साल में ही सूरत बदल गयी और अब विद्यालय में 99 बच्चे हैं। गरीब बच्चों को वह न सिर्फ पढ़ाते हैं बल्कि उन्हें कॉपी-किताब और ड्रेस तक की जिम्मेदीरी उठा रखी है। उन्होंने न सिर्फ कंथुआ बल्कि कई गांवों के करीब पांच सौ लोगों को प्रोत्साहित कर उन्हें स्कूलों तक पहुंचवाने का काम किया है।

 

रण विजय के लिये नौकरी काम उनकी जिम्मेदारी हैं। नौकरी सिर्फ तय घंटे स्कूल में काट लेना भर नहीं। काम जब दिल के करीब हो तो उससे प्यार हो जाता है। शायद इसीलिये उन्होंने तीन बड़ी नौकरियां छोड़कर मास्टरी कर ली। परिषदीय शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाते हुए शिक्षण व्यवस्था में उन्होंने मामूली बदलाव कर बच्चों में पढ़ने की ललक पैदा करने का काम किया है। उनके इस प्रयास से गांव के तमाम लोग खुश हैं और उनका गुणगान करते नहीं थकते।

 

रणविजय निषाद ने बताया कि उन्होंने जब स्कूल ज्वाइन किया तो छठीं से आठवीं तक के सरकारी स्कूल में लोग बच्चों को भेजने को तैयार नहीं थे। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी बच्चों को नहीं पढ़ा पाते थे।

 

आठ साल में छोड़ीं तीन नौकरियां, 2011 में बने शिक्षक

हेडमास्टर रणविजय निषाद कृषि से एमएससी करने के बाद 2004 में सीआइएसएफ में सब इंस्पेक्टर बने। दो साल बाद वहां से इस्तीफा देकर कृषि विज्ञान केंद्र में विषय विशेषज्ञ बने। वहां भी मन नहीं लगा तो 2008 में बीज विकास निगम में नौकरी कर किसानों को उन्नत खेती के प्रति जागरूक किया। चूंकि वह पढ़ाई के दिनों से बच्चों को पढ़ाने का शौक था सो वह इसके लिये बेचैन थे। आखिरकार 2011 में शिक्षक बने। मार्च 2016 में उनकी तैनाती उनके गांव कंथुवा के स्कूल में हुई।

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