#TeachersDay: 45 सालों से संस्कृत के लिए लड़ाई लड़ रहे हयात उल्ला, रिटायरमेंट के बाद भी जगा रहे शिक्षा की अलख

चारों वेद में पारंगत है हयात उल्ला, मजहब की दीवार तोड़ मिली है चतुर्वेदी की उपाधि

By: Akhilesh Tripathi

Updated: 05 Sep 2019, 04:37 PM IST

कौशांबी. आज भी हमारे समाज में कई शिक्षक हैं जो निस्वार्थ भाव से बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं । कौशाम्बी जिले के हयात उल्ला कुछ ऐसी ही शख्सियत है जो धर्म से मुस्लिम है लेकिन पिछले 45 सालो से संस्कृत के लिए लड़ाई लड़ रहे है। यही नहीं हिन्दू धर्म के चारो वेदों में पारंगत होने पर उन्हें चतुर्वेदी की उपाधि मिली है। 75 की उम्र पार कर चुके इस शिक्षक का मानना है कि संस्कृत ही एक ऐसी भाषा है जो मजहबी दीवार को तोड़ कर एक नए हिंदुस्तान का निर्माण कर सकती है। यही कारण है कि इस उम्र में भी स्कूल-दर-स्कूल बच्चो को पढ़ाने में उनके कदम कभी नहीं रुकते है। हयात उल्ला चतुर्वेदी की उम्र करीब 75 साल हो चुकी है, वह 14 साल पहले रिटायर हो चुके हैं, लेकिन पढ़ाने का मोह नहीं छूटा। विषय भी ऐसा कि लोग पसीना छोड़ देते हैं, यही विषय उनकी पहचान बना और आज वह देश के कोने-कोने में जाने जाते हैं।

चतुर्वेदी की उपाधि उनको दशकों पहले सम्मान में दी गई लेकिन नहीं मिला तो राष्ट्रपति पुरस्कार। इसका उन्हें मलाल भी नहीं है। लेकिन जब बात पुरस्कार की होती है तो बरबस हयात उल्ला चतुर्वेदी का नाम बुद्धिजीवियों की जुबान पर आ जाता है। धर्म से मुस्लिम होने के बाद भी हयात उल्ला साहब की लगन ने संस्कृत भाषा का विद्वान बना दिया । हयात उल्ला चतुर्वेदी साहब का मानना है कि भाषा का ज्ञान मजहब की दीवार को गिरा देता है जो आज के समय की बुनियादी जरूरत है। बच्चो के बीच ज्ञान बांटने का ऐसा जज्बा है कि उम्र की लाचारी की आड़े नहीं आती, छात्र भी उनका बहुत सम्मान करते हैं। हयात उल्ला चतुर्वेदी ने अपने संरक्षण में कई लड़कों को पढ़ाया। आज वह संस्कृत विषय से शिक्षक हैं और अपने गुरू का गुणगान गा रहे हैं।

बच्चों का कहना है कि उनको गर्व है की वह एक अनोखी धरोहर रुपी अध्यापक से शिक्षा प्राप्त करते है। बच्चो के मुताबिक हयात उल्ला चतुर्वेदी का पढ़ने का तरीका दूसरे अध्यापको से अलग है, वह बच्चो को समझाने के लिए हिंदी उर्दू और संस्कृत भाषा का जब प्रयोग करते है तो उन्हें बेहतर समझ में आता है । गंगा-यमुनी तहजीब की धरती पर आज भी ऐसे लोग है, जिन्होंने अपनी विद्वता का लोहा देश और दुनिया में मनवाया है कौशाम्बी जिले के हयात उल्ला भी एक ऐसी ही शख्सियत है।

मुस्लिम परिवार में जन्मे हयात उल्ला को बचपन से ही देवो की भाषा संस्कृत से प्रेम रहा और यही कारण रहा कि उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री भी संस्कृत से ली। जिन्दगी के सफ़र की शुरूआत एक शिक्षक के रूप में की और अनवरत रिटायर्डमेंट के बाद भी यह शिक्षक आज भी बच्चो में संस्कृत का अलख जगा रहा है। छीता हर्रायपुर निवासी हयात उल्ला पुत्र बरकत उल्ला को संस्कृत से प्यार है और लगाव है। चारों वेदों का उन्हें ज्ञान है। घर में भी उनके संस्कृत भाषा से बातचीत होती है। 1967 में हयात उल्ला को एक राष्ट्रीय सम्मेलन में चतुर्वेदी की उपाधि दी गई तो पूरा देश गदगद हो गया। हयात उल्ला एमआर शेरवानी इंटर कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते थे। 2003 में वह रिटायर हुए। इसके बाद भी उन्होंने छात्रों को पढ़ाना नहीं छोड़ा। महगांव इंटर कॉलेज में वह छात्रों को पढ़ाते हैं। संस्कृत विषय में उन्होंने कई किताबे लिखी हैं। हाईस्कूल की परिचायिका को भी उन्होंने अनुवादित कर सरल बनाया है। इसके अलावा दिग्दर्शिका छपने वाली है। संस्कृत के प्रचार व प्रसार के लिए वह राष्ट्रीय एकता के लिए अमेरिका, नेपाल आदि देशों में सेमिनार भी कर चुके हैं।

BY- SHIV NANDAN SAHU

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