पढ़ाई का एेसा जुनून कि डंडों की बैसाखी के सहारे रोज आधा किमी चलकर स्कूल पहुंचती है जुड़वां बहनें

पढ़ाई का एेसा जुनून कि डंडों की बैसाखी के सहारे रोज आधा किमी चलकर स्कूल पहुंचती है जुड़वां बहनें

Akanksha Agrawal | Updated: 08 Aug 2019, 03:24:59 PM (IST) Kawardha, Kabirdham, Chhattisgarh, India

Chhattisgarh Motivational Story: पढ़ाई की एेसी ललक कि छत्तीसगढ़ की दिव्या दोनों पैरो से निशक्त (Handicapped) होने के बाद भी दो डंडों की बैसाखी के सहारे रोजाना आधा किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती है।

इंदौरी. हम भी दरिया है हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ निकलेंगे रास्ता बन जाएगी। किसी शायर द्वारा कही ये पंक्तियां दिव्या पर सटीक बैठती है। इंसान के यदि हौंसले बुलंद और इरादा नेक हो तो विकलांगता उसकी राह में कत्तई रोड़ा नहीं बन सकती है। जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर ग्राम अमलीडीह में दो जुड़वां बहनों को देखकर यह पंक्ति जीवंत होती दिखाई देती है।

कवर्धा विकासखंड बिपतरा पंचायत के आश्रित ग्राम अमलीडीह में रोजाना सुबह करीब साढ़े नौ बजे एक ऐसा नजारा सामने आता है, जो दिल को छू जाता है। नौ साल की दिव्या साहू दोनों पैर से नि:शक्त है, बिना सहारे पांच सेकण्ड भी खड़े नहीं रह सकती है। लेकिन हर कोई यह देखकर आश्चर्य रह जाते हैं कि दोनों पैर से नि:शक्त होने के बाद भी यह बालिका दो डंड के सहारे से रोजाना स्कूल जाती है।

शिक्षा ग्रहण करने का जुनून इस कदर है कि किसी तरह स्कूल जाना ही है। बारिश होने लगे तो चाचा पवन साहू के कंधे पर सवार होकर स्कूल पहुंचती है। इस जुनून के चलते ही दिव्या आज कक्षा दूसरी की होनहार छात्रा है। प्राथमिक शाला के प्रधानपाठिका मोहिनी साहू भी बताती हैं दिव्यांग होने के बाद भी शिक्षा के प्रति दिव्या की ललक देखते ही बनती है। दिव्या से पुछने पर बताया कि बड़ी होकर वह डांक्टर बनना चाहती है ताकि दिव्यांगों का ईलाज कर सके।

रिक्षी अपने दिव्यांग बहन दिव्या के साथ बखूबी निभा रही है। सुबह तैयार होकर दोनों जुड़वां बहनें साथ निकलती है। लेकिन उनके चेहरे की खुशी इस बात का अहसास बिल्कुल नहीं होने देती है कि उन्हें किसी भी तरह का अभाव है।

जुड़वां बहनों को सूझी तरकीब
दिव्या साहू कक्षा दूसरी में पढ़ती है और उनकी जुड़वां बहन रिक्षी साहू कक्षा तीसरी की छात्रा है। दिव्या के पैरों की वजह से उसे करीब आधा किलोमीटर दूर स्कूल जाने में आ रही मुश्किलों को देखते हुए दोनों जुड़वां बहनों ने तरकीब निकाली और दो डंडे के सहारे अस्थाई बैसाखी बना ली। कापी पुस्तक से भरा बैग पीछे लटका लेते हैं। खुले पैर से लडखड़़ाते कदमों से दूरी तय कर स्कूल पहुंचती हैं।

ट्राइसिकल के लिए लगा चुकी हैं गुहार
दिव्या के पिता प्रभू साहू भूमिहिन हैं। रोजी मजदूरी कर घर चलाता है। दिव्या जन्म से दोनों पैर से दिव्यांग हैं। परिजन पलायन कर रुपए इकठ्ठा कर दिव्या की पैर की ईलाज कराया, बावजूद सुधार नहीं हुआ। परिजन बताते हैं कि दिव्या को पढऩे की ललक है। कई बार शासन-प्रशासन से दिव्या के लिए ट्राइसिकल की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन विभाग के अधिकारी उनकी ओर ध्यान नहीं देते।

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