छत्तीसगढ़ के 1000 साल पुराने भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह में घुसा बारिश का पानी, खतरे में धरोहर, प्रशासन ने मूंदी आंखेंं

कवर्धा के सुप्रसिद्ध छत्तीसगढ़़ के खजुराहो भोरमदेव मंदिर के भीतर में पानी का रिसाव बढ़ता जा रहा है। जिससे इस प्राचीन धरोहर के सरंक्षण को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

By: Dakshi Sahu

Published: 16 Sep 2021, 04:58 PM IST

कवर्धा. कवर्धा के सुप्रसिद्ध छत्तीसगढ़़ के खजुराहो भोरमदेव मंदिर के भीतर में पानी का रिसाव बढ़ता जा रहा है। जिससे इस प्राचीन धरोहर के सरंक्षण को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यहां पानी का रिसाव इस कदर बड़ गया है मंदिर के गर्भगृह में भी जल भराव की स्थिति आ गई है। मंदिर की एक तरफ की नींव भी धस रहा है। इन दोनों बातों की खबर पुरातत्व विभाग और जिला प्रशासन को भी है लेकिन अभी तक कोई सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाया गया है।

अधिक बारिश होने पर या लगातार रिमझिम बारिश से ही रिसाव बढ़ जाता है। बुधवार रात अधिक बारिश होने से मंदिर में पानी ज्यादा तेजी से रिसने लगा है। मंदिर के गर्भगृह में पुजारियों को बैठने की जगह नहीं बन रही। भोरमदेव मंदिर में इस तरह की समस्या कोई नई नहीं है। सालों से इस तरह की दिक्कत बनी हुई है। अभी हाल में लगातार बारिश हुई। मंगलवार की रात व बुधवार सुबह की बारिश से मंदिर में रिसाव अधिक होने लगा, जिससे मंदिर परिसर में भी पानी भरा रहा।

पुजारियों ने बाल्टी से बाहर निकाला पानी
पानी एक ही नहीं बल्कि जगह-जगह से रिस रहा है जिसके कारण पानी को एकत्रित करने के लिए बाल्टी, डब्बे व बर्तन रखे गए। फिर भी पानी गर्भगृह और सामने के प्रवेश करने वाले परिसर में भर गया है, जो मंदिर के लिए अच्छा ***** नहीं माना जा सकता है। गर्भगृह में कई देवी देवताओं की विभिन्न मुद्राओं वाली मूर्तियां हैं जिस पर भी पानी रिसकर टपक रहा है। मतलब साफ है कि मंदिर की दीवारों व गुंबज की दरारें बढ़ती जा रही हैं। इस पर शासन व प्रशासन को अभी से ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि समय रहते दरारों को भरा जा सके।

छत्तीसगढ़ के 1000 साल पुराने भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह में घुसा बारिश का पानी, खतरे में धरोहर, प्रशासन ने मूंदी आंखेंं

एक हजार वर्ष पुराना मंदिर
भोरमदेव मंदिर की बनावट और कलाकृति मध्यप्रदेश के खजुराहो और उड़ीसा के कोणार्क के मंदिर से की जाती है, जिसके कारण ही इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहते हैं। यह एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपाल देव ने बनवाया व शिवलिंग की स्थापना कराई थी। लंबा समय गुजरने के बाद इसकी मजबूती में फ र्क पडऩा लाजमी है। इतने सालों तक इस ऐतिहासिक धरोहर का टिकना अपने आप में अद्भूत है, लेकिन वर्तमान में जो दिक्कतें आ रही है, उस पर सुधार करना भी जरूरी है। क्योंकि इस पर जिला प्रशासन अपनी ओर से कोई सुधार कार्य नहीं करवा सकती है। पुरातत्व विभाग ही इस पर कुछ कर सकता है।

वर्षों से दिक्कत, बावजूद सुधार नहीं
भोरमदेव मंदिर में ये स्थिति सालों से बनी हुई है, लेकिन बारिश का मौसम निकलते ही सुधार की दिशा में काम नहीं किया जाता। भूल जाते हैं, फिर वही बारिश के मौसम में यह हालात बनते हैं। साल दर साल इसके रिसाव की मात्रा बढ़ती जा रही है। यदि जल्द इसका सुधार नहीं किया गया, तो परेशानी बढ़ सकती है। मंदिर की दीवारों पर दरारें ज्यादा होने पर पानी का रिसाव भी ज्यादा होगा, जिससे मंदिर की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। भारतीय पुरातत्व विभाग को इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है।

पत्र लिखा गया
कलेक्टर कबीरधाम रमेश कुमार शर्मा ने बताया कि इसके लिए हमने पहले भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को पत्र लिखा था। भोरमदेव मंदिर की देखरेख की पूर्ण जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है। इसमें प्रशासन कुछ भी नहीं कर सकता। इसके लिए ही मंदिर के निरीक्षण व आवश्यक कार्य के लिए पत्र लिखा गया। एक बार फिर से उन्हें अवगत कराया जाएगा। पुजारी भोरमदेव मंदिर आशीष पाठक ने बताया कि अधिक बारिश से रिसाव भी तेजी से होता है। कई मूर्तियों पर पानी टपक रहा है। गर्भगृह में बैठने की जगह नहीं है। बारिश में हर साल इस तरह की स्थिति बनती है। इस साल कुछ ज्यादा ही रिसाव हो रहा है। समिति के पदाधिकारियों को इससे अवगत करा दिया गया है।

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