आंखे नहीं है फिर पा लिए इस नेशनल तैराक ने 8 मेडल, गजब है इस नेत्रहीन की जज्बा

नेत्रहीन शिवपाल की बांसुरी, महेश और मोती की सुरीली आवाज कानों में घोलती रस

By: dharmendra diwan

Published: 03 Dec 2019, 02:14 PM IST

धर्मेंद्र दीवान। खंडवा. इरादे मजबूत और हौसले बुलंद हो तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है, बस जरूरत है मेहनत और लगन की। शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम नहीं होने पर लोग दूसरों पर आश्रित होने लग जाते हैं, लेकिन शहर में कुछ दिव्यांग ऐसे हैं जिन्होंने अपनी विकलांगता को कमजोरी नहीं समझा और अपने मजबूत इरादों से न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाना, साथ ही समाज में एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। हम बात कर रहे हंै आनंद, शिवपाल, महेश और मोतीसिंह की जिन्होंने तैराकी और आवाज से खुद को आत्मनिर्भर बनाकर अपने माता-पिता का नाम गौरवान्वित किया। दिव्यांग दिवस पर पत्रिका की खास रिपोर्ट।

बचपन की ललक ने आनंद को बनाया राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी
एसएन कॉलेज में बीए की पढ़ाई करने वाले 20 वर्षीय आनंद पिता गुनवत राव बावस्कर बचपन से नेत्रहीन है। आनंद नेशनल तैराक है। उसने 12वीं तक महाराष्ट्र के हनुमान व्यायाम प्रसारण मंडल शाला अमरावती से पढ़ाई की। आनंद ने बताया उसे तैरने की ललक बचपन से थी। जब वहां नदी पर दोस्तों के साथ में नहाने जाता था। तब उसने कक्षा 6वीं में स्कूल में शिक्षक प्रशांत गाड़वे से तैराकी सीखने की इच्छा जताई। इसके बाद शिक्षक ने उसे तैरना सिखाया। आनंद ने नेशनल तैराकी प्रतियोगिता में 7 मेडल जीत चुका है। इसमें 4 गोल्ड, 3 सिल्वर और 2 ब्रांच मेडल शामिल है। वह विशेष ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेना चाहता है।

दृष्टिबाधित युवाओं ने बनाया म्यूजिक ग्रुप
गणेशतलाई स्थित निमाड़ अंचल नेत्रहीन संस्था के 6 दिव्यांग विद्यार्थियों का स्वयं का म्यूजिक ग्रुप है। इसमें सभी हर यंत्र को बजाने और गाने में माहिर हैं। ग्रुप ने कई शानदार प्रस्तुतियां दी। इनकी आवाज और हुनर से जो भी पहली बार रूबरू होता है, अचरज मेें पड़ जाता है। राजगढ़ (ब्यावरा) निवासी विशाल सोलंकी हारमोनियम, पुरनी के शिवपाल सिंह बांसुरी, भावसिंहपुरा (खरगोन) के परसराम मसानी तबला और ग्राम भगावां निवासी परमराम कास्डे, गुड़ी के महेश सेठिया और विदिशा के मोतीसिंह गायक के रूप में जुड़े हैं। ये सभी स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के साथ संगीत कॉलेज से डिप्लोमा कर रहे हैं। अमृतसर, जयपुर, रतलाम में गायन, तबला व अन्य विधा में प्रस्तुतियां दे चुके हैं।

बोलने और सुनने में अक्षम अमित ऑफिद में देता है अपना 101 फीसदी
सामाजिक कल्याण विभाग में कम्प्यूटर पर काम करते मूकबधिर अमित शर्मा। अपने साथी से इशारों में बातचीत कर काम को समझा रहे है।
यह है मूकबधिर दिव्यांग अमित पिता रामनरेश शर्मा खंडवा के निवासी। यह बचपन से न बोल और न ही सुन सकता है, लेकिन इस कमी को वह कभी अपनी कमजोरी बनाकर चुप नहीं बैठा। बचपन से ही पढ़ाई जारी रखी। चैन्नई के दिव्यांग विशेष कॉलेज से बीकॉम और खंडवा से पीजीडीसीए का डिप्लोमा किया। इसके बाद मेहनत और काबिलियत से सरकारी नौकरी प्राप्त की। अमित सामाजिक न्याय एवं नि:शक्तजन कल्याण विभाग खंडवा में सहायक ग्रेड 3 के पद पर पांच साल से पदस्थ है। अमित कम्प्यूटर पर टाइपिंग, इंटरनेट और मोबाइल सहित ऑफिस के सारे काम संभाल लेता है।

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