मर्जी हो तो रखते, नहीं तो धूनी में स्वाह कर देते थे दादाजी धूनीवाले 

मर्जी हो तो रखते, नहीं तो धूनी में स्वाह कर देते थे दादाजी धूनीवाले 

दादाजी धाम में  लिखा है कि दादाजी को न मानने वाले यहां न आए। 24 बिंदुओं की नियमावली आज भी अक्षरश: पालन होती है।मध्यप्रदेश के खंडवा में दादा दरबार में गुरुपूर्णिमा पर लाखों की संख्या में उनके भक्त जुटते हैं.. चार दिवसीय गुरुपूर्णिमा महोत्सव में 6 जुलाई 2017 से शुरू हो गया ..  

खंडवा. दादाजी धाम में भक्तों का मेला लगना शुरू हो गया है। चार दिवसीय गुरुपूर्णिमा महोत्सव के लिए ट्रस्ट के साथ शहरवासियों ने भी भक्तों के स्वागत के लिए तैयारी कर ली है। ट्रैफिक पुलिस ने गुरुपूर्णिमा को देखते हुए शहर में चार दिन के लिए नई व्यवस्था बनाई है। ये व्यवस्था 6 से 9 जुलाई तक लागू रहेगी। ताकि जिले सहित अन्य जिलों से पहुंचने वाले भक्तों को परेशानी न उठाना पड़े। इसमें मार्ग डायवर्ट, पार्र्किंग व्यवस्था, नो व्हीकल जोन, तीन पहिया वाहन, चार पहिया वाहन सहित भारी वाहनों पर प्रतिबंध रहेगा। वहीं भक्तों की अधिक संख्या को देखते हुए चार अस्थायी बस स्टैंड भी बनाए गए हैं। 
ट्रस्ट के मुताबिक, बुधवार सुबह से रात तक करीब 35 हजार भक्तों ने दर्शन किए जबकि चार हजार भक्तों ने दादाजी धाम व भक्त निवास में डेरा डाल दिया है। दिनभर में सात जत्थों ने निशान चढ़ाए। दादाजी की भक्ति में रमे ये भक्त निशान लेकर पहुंचे तो गुलाल से सराबोर नजर आए। गुरुवार से चार दिनी उत्सव की शुरूआत होगी। मप्र सहित महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली व शेष भारत से भक्त दादाजी दरबार पहुंचेंगे। 5 लाख से ज्यादा भक्त यहां दर्शन करेंगे। 




Devoties of dada darbar of khandwa
275 किमी पैदल चल पहुंचे गुरुधाम
'गुरु मन्हा होता हो, साधा भोया, याद एेस तुनी सेवानंददादा' अर्थात गुरु मेरे इतने सरल थे कि उनकी याद अब हर पल आती है। एेसे गीत गाते हुए महाराष्ट्र के जलगांव के सांगवी से जत्था बुधवार दोपहर बाद दादाजी धाम पहुंचा। 1300 सदस्य यहां 275 किमी का सफर पैदल तय कर पहुंचे हैं। इनके काफिले में 22 चारपहिया, 30 दोपहिया वाहन हैं। इन वाहनों से ही वापस जाएंगे। रामकृष्ण पाटील, नारायण बाविस्कर, प्रदीप पाटील व अन्य ने कहा कि गुरु परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।


Dhooni mai of dadaji dhuniwale darbar of khandwa
बूंदी प्रसादी बनेगी, डोम का काम होगा पूरा
दादाजी धाम में गुरुवार से बूंदी प्रसादी बनना शुरू होगी। रैलिंग व वाटरप्रूफ डोम का काम भी पूरा हो जाएगा। व्यवस्थाएं चाक-चौबंद किए जाने के लिए पूरे दिन तैयारी चलती रही। एलईडी व प्रोजेक्टर भी लगाए जाएंगे। बुधवार को मां नर्मदा की प्रतिमा उनके मूल स्थान पर विराजित कर दी गई है। बता दें कि अब तक मंदिर में मार्बल लगाकर इसके नवीनीकरण का काम चल रहा था। अमूल्य दर्शन गृह भी भक्तों के लिए खोल दिया गया है। कला गुरु बैजनाथ सराफ और उनकी शिष्या आकृति अत्रे द्वारा धूनीमाई की दीवार पर निमाड़ की लोककला उकेरी जा रही है। भित्ती चित्र बनाकर इन्होंने यहां आने वाले भक्तों का परिचय लोककला से कराने के प्रयास किए हैं।


सिद्धपीठ में 24 घण्टे दर्शन
आध्यात्मिक मानचित्र पर खण्डवा का नाम श्री दादाजी धूनीवाले के कारण प्रमुखता से स्थापित है। बीसवीं सदी के महान संत स्वामी केशवानंदजी और उनके शिष्य श्री हरी हरानंदजी के इस जीवंत समाधि स्थल पर लाखों लोग प्रतिवर्ष मत्था टेकने आते है। अखण्ड धूनी, अखण्ड ज्योत, 24 घण्टे दर्शन के लिए द्वार खुला रहना सहित अनेक विशेषताओं के कारण यह अनूठा स्थान है। पंडे-पुजारी से मुक्त स्वयं अपने हाथों से सेवा, हवन का सौभाग्य है भक्तों को। भक्त और भगवान के मध्य यहां कोई और नहीं है। दादा दरबार खंडवा एकमात्र सिद्धपीठ जो वर्षभर, 24 घण्टे दर्शन के लिए खुला रहता है। इसके पट कभी भी भक्तों के लिए बंद नहीं होते। न तो ग्रहण में और न ही रात्रि में, दर्शन सदैव संभव है। श्री छोटे दादाजी महाराज ने 1937 में श्री दादा दरबार के नियम व कार्यक्रम बनाए थे। तब से आज तक इन नियम व कार्यक्रम का पालन मुस्तैदी से हो रहा है। 


Devoties of khandwa dhuniwale baba


धूनी की महिमा
बड़े दादाजी अर्थात स्वामी केशवानंदजी महाराज को धूनीवाले दादाजी कहा जाता है। दादाजी स्वयं अपने समक्ष धूनी प्रज्जवलित करते और बैठते थे। वास्तव में धूनी अर्थात अग्रि का प्रतीक है। शक्ति का प्रतीक है। ऊर्जा का प्रतीक है। हिन्दू धर्म में हवन का अनादिकाल से उल्लेख है। दादाजी के बारे में कहते हैं कि सदैवी धूनी रमाकर बैठते। भक्त उन्हें जो भी अर्पित करते चाहे वह नैवैध, कपड़ा, आभूषण। मर्जी हो तो वे रखते, नहीं तो धूनी में स्वाह कर देते थे। छोटे दादाजी के समय भी धूनी मैया में हवन की परंपरा अलौकिक व भव्य रही। खंडवा के श्री दादाजी दरबार में छोटे दादाजी बोरे भर-भर काजू-बादाम, पिस्ते, 
नारियल, घी,शक्कर, से हवन करते थे। जैसी धूनी की महिमा अथवा भव्यता या विशालता खंडवा में है। इतनी बड़ी धूनी या धूना पूरे देश में कहीं नहीं है। अखाड़ों में धूनी होती है, मगर अखंड धूनी वो भी 79 वर्षों से, उस पर भी सबके पूजन हवन के लिए नहीं होती। खंडवा में 24 घंटे चाहे जब हवन पूजन कोई भी व्यक्ति कर सकता है। दरबार में दो पवित्र समाधियों के अतिरिक्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण धूनी ही है, जो स्वयं दादाजी ने 1930 में प्रज्जवलित की है। धूनी की साफ-सफाई (पखारना) प्रतिदिन सुबह 4 बजे शाम 4 बजे मर्यादा के साथ होती है। इसकी भस्म औषधि के रूप में श्रद्धालु अपने साथ ले जाते हैं।
 
जहां कभी दरवाजे बंद नहीं होते
दादाजी की समाधिस्थल वास्तव में मंदिर नहीं, बल्कि दरबार है। इसे दादा दरबार कहा जाता है। दुनिया का एकमात्र दरबार, जहां कभी दरवाजे बंद नहीं होते। 24 घंटे 365 दिन दर्शन संभव है। ग्रहण में भी यहां के पट बंद नहीं होते। दादाजी स्वयं शंकर भगवान के अवतार थे। अत: यहां ग्रहण कैसा? यहां की सेवाएं, अभिषेक, आरती, पूजन, नैवैद्य निर्धारित समय पर सदैव लगता है, जो कभी बाधित नहीं होता। दरबार के मुख्य द्वार पर 1935 का लकड़ी का तख्ता खुदा हुआ लगा है।  जिस पर लिखा है कि दादाजी को न मानने वाले यहां न आए। श्री छोटे दादाजी महाराज ने दरबार संचालन हेतु 24 बिंदुओं की एक नियमावली 
लिपिबद्ध करायी थी, जो आज भी अक्षरश: पालन होती है। न केवल खंडवा अपितु खंडवा के बाहर तमाम दरबार इसे दादाजी का आदेश मानकर पालन करते हैं। दरबार में आज भी सेवाधारी पहरा व सेवा करते हैं। 

जिसे दादाजी का डंडा पड़ गया, वो तर जाता था
श्रद्धालु दादाजी को अर्जी देते हैं। श्रद्धापूर्वक जो मांगते हैं, ईश्वर उसे पूर्ण करता है। दरबार की परंपरा दादाजी महाराज के समय से है, जब हजारों लोग दादाजी के पास आते थे और वे उनकी दुख-तकलीफ-बाधाएं दूर करते थे। दादाजी की लीलाएं विचित्र थी, कभी वे दुलारते, तो कभी डंडा फटकारते। कहते हैं जिसे दादाजी का डंडा पड़ गया, वो तर जाता था। उनकी अटपटवाणी अद्भुत थी।अवधूत संत की लीलाएं अनेक हैं। ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जो सिद्ध करती है कि दादाजी ईश्वरीय अवतार है। आज तक लाखों लोग समाधि की ओर आकर्षित हो चले आते हैंं। एक चुंबकीय आध्यात्मिक ताकत है।

पण्डे पुजारी से मुक्त श्रीदादा दरबार
छोटे दादाजी के पास भक्तों का मेला सदैव लगा रहता था। मालपुआ, लड्डू, टिक्कड़ प्रसादी के थाल दादाजी के पास रखे रहते। वे जिसको मर्जी टिक्कड दे देते, तो जिसको मर्जी मालपुआ लड्डू देते। बड़े-बड़े राजा महाराजा यहां ढेरा डाले रहते। सेनापति-जवार साथ लाकर सामने ही पांडाल लगाकर भंडार बनाते। इलाहाबाद के राजा तो कभी बाराबंकी, पन्ना के राजा, बड़े-बड़े मालगुजार सेठ साहूकार अपना राजपाठ छोड़ छोटे दादाजी के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देते थे। 

किसी भी दानदाता का नाम नहीं
दादाजी दरबार में शुरू से ही परंपरा रही कि यहां पाने वाले दादाजी देने वाले दादाजी का जोर रहा। दादाजी महाराज नाम करके कुछ भी दान से परहेज रखते। अपने को मिटाकर यहां आने वाला ही कुछ पा सकता है। संभवत: यह सोच दादाजी की रही। यही कारण है कि खंडवा का श्रीदादा दरबार ऐसा धार्मिक क्षेत्र है, जहां कहीं भी किसी भी दानदाता का नाम नहीं है। जो कुछ है, वो दादाजी का है। इससे बड़ी बात कि यहां दान मांगा नहीं जाता। दानपत्र में मर्जी है, तो भेट राशि दे। यहां पण्डे, पुजारी, सेवादार कभी किसी को कहीं पर मत्था टेकने या पूजन करवाने या दान लिखवाने के लिए प्रेरित तक नहीं करते। छोटे दादाजी ने विधिवत नियमावली में तक इसके स्पष्ट उल्लेख किया है।

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