scriptsant singaji samadhi dham beed khandwa sharad purnima 2021 | नर्मदा नदी में है संत सिंगाजी की समाधि, अद्भुत है यहां का नजारा | Patrika News

नर्मदा नदी में है संत सिंगाजी की समाधि, अद्भुत है यहां का नजारा

sant singaji samadhi: शहर पूर्णिमा पर हर साल लगता है भक्तों का मेला, इस बार दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किए दर्शन...।

खंडवा

Updated: October 21, 2021 10:54:09 am

बीड़ (खंडवा)। निमाड़ के प्रसिद्ध निर्गुण संत सिंगाजी महाराज समाधि स्थल पर मुख्य दिवस शरद पूर्णिमा के मौके पर दो लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पहुंचकर दर्शन किया। शाम पांच बजे झाबुआ राजघराने से आया निशान चढ़ाया गया। वहीं भक्तों ने सिंगाजी महाराज से सुख, शांति, समृद्धि की कामना की। मेले में सुबह से रात तक ढाई लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने माथा टेका। श्रद्धालु महिला, पुरुषों ने में संत सिंगाजी को प्रसादी स्वरूप नारियल, चिरौंजी का प्रसाद चढ़ाया।

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संत सिंगाजी धाम पर शरद पूर्णिमा पर लगता है आस्था का मेला, आज भी होते हैं चमत्कार

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मंगलवार सुबह से ही भक्तों के सिंगाजी समाधि स्थल पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने मन्नत पूरी होने पर समाधि स्थल पर दर्शन कर घी चढ़ाया। वहीं जानकारी के अनुसार शरद पूर्णिमा के मौके विशेष महाआरती व सिंगाजी महाराज को प्रमुख निशान जो राजघराने से आता है वह चढ़ाया गया। इस बार बीस बैरल देशी घी, 15 क्विंटल से अधिक चिरौंजी 70,000 से अधिक नारियल संत सिंगाजी समाधि स्थल पर चढ़ाए।

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दिनभर देसी हलवे की प्रसादी का वितरण चलता रहा। कोरोना की वजह से इस बार बड़े स्तर पर मेला तो नहीं लगाया गया, लेकिन संत सिंगाजी समाधि स्थल पहुंचकर दर्शन कर चिंरौजी व देशी घी चढ़ाने की अनुमति दी गई है। इस दौरान विधि विधान से भक्तों द्वारा लाए गए निशान भी चढ़ाए गए। मंदिर परिसर व मेला ग्राउंड में 40 से 50 दुकानें लगी हैं। इस दौरान सुरक्षा की दृष्टि से बीड़, मूंदी पुलिस सहित बाहर से आए पुलिसकर्मी तैनात दिखे वहीं सिंगाजी समाधि स्थल पर स्थानीय क्षेत्र के अन्य युवा भी व्यवस्थाओं में सहयोग किया।

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कौन थे सिंगाजी महाराज

  • मालवा-निमाड़ के संत सिंगाजी का जन्म सन 1519 में पिपलिया नामक कस्बे के निकट खजूरी गाँव में ग्वाला परिवार में हुआ था। इनके जन्मस्थान (खजूरी ग्राम) का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया है।
  • सिंगाजी मध्य प्रदेश में खंडवा से 28 मील उत्तर-पूर्व हरसूद तहसील का एक छोटा-सा गांव है। हरसूद का निर्माण हर्षवर्धन द्वारा किया गया था। इसी गांव में सिंगाजी एक सामान्य गोपाल या अहीर परिवार में जन्मे थे। वे बचपन से ही एकांत स्वभाव के थे। जब वन में जानवरों को चराने जाते तो वहां प्रकृति के बीच रमे रहते थे।
  • 16वीं शताब्दी में सिंगाजी की प्रतिभा से प्रेरित होकर गांव के जमींदार ने उन्हें अपना सरदार बना दिया था। सिंगाजी ने 12 वर्ष जमींदार की सेवा की। अपनी आध्यात्मिक करामाती शक्तियों से ज़मींदार के लिए कई लड़ाइयों में विजय भी प्राप्त की।
  • संत सिंगाजी को निमाड़ का कबीर भी कहा जाता है। आज भी निमाड़ में उनके जन्म स्थान व समाधि स्थल पर उनके पदचिह्नों की पूजा-अर्चना की जाती है। उनके चमत्कार आज भी लोग महसूस करते हैं।
  • पशुपालक उन्हें पशु दूध और घी अर्पण करते हैं। इन स्थानों पर घी की अखण्ड ज्योत भी प्रज्वलित रहती है।
  • पिता भीमाजी गवली और माता गवराबाई की तीन सन्तान थीं। बड़े भाई लिम्बाजी और बहन का नाम किसनाबाई था। सिंगाजी का जसोदाबाई के साथ विवाह हुआ था। इनके चार पुत्र—कालू, भोलू, सदू और दीप थे। सिंगाजी के जन्म और समाधिस्थ के बारे में विद्वानों के मत अलग-अलग है। कोई उनका जन्म 1574 में बताता है तो कोई 1576 में। इसके अलावा किसी विद्वान ने उनका जन्म 164 और 1616 बताया है।

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