मौसम की मार से खराब हुआ तरबूज, लागत भी नहीं मिल रही थी, किया दान

सेवा भारती से जुड़े युवा किसान ने माल को फेंकने की बजाए तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में लॉक डाउन के चलते भोजन के लिए तरस रहे वानरों, गोवंश के लिए भेजना उचित समझा।

By: harinath dwivedi

Published: 20 May 2021, 11:38 AM IST

खंडवा. प्रकृति की मार से खराब हुई फसल की लागत भी किसान को नहीं मिल रही थी। सेवा भारती से जुड़े युवा किसान ने माल को फेंकने की बजाए तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में लॉक डाउन के चलते भोजन के लिए तरस रहे वानरों, गोवंश के लिए भेजना उचित समझा। बुधवार को भारतीय किसान संघ, सेवा भारती के सहयोग से 10 टन तरबूज मंगलदास बाबा के आश्रम भेजा गया। ये तरबूज वहां बंदरों और गायों को भोजन में दिया जाएगा।
ग्राम बावडिय़ा काजी, बखार में कई किसानों ने तरबूज की खेती लगा रखी है। खराब मौसम के चलते इस बार किसानों के तरबूज छोटे रह गए, जिसके कारण दो से तीन रुपए किलो का भाव मिल रहा था। कई किसान तो पहले ही तरबूज खेतों से निकालकर फेंक चुके थे। युवा किसान पवन साद ने भी दो एकड़ में तरबूज लगाया था, जो कि साइज छोटा होने से बिक नहीं रहा था। पवन साद ने तरबूज फेंकने की बजाए दान करने की सोची। सेवा भारती से जुड़े होने से ओंकारेश्वर में मंगलदास बाबा के आश्रम में संपर्क किया। बुधवार को आश्रम से वाहन भेजा गया। जिसमें सेवा भारती और भाकिसं के कार्यकर्ताओं ने माल लोड कर ओंकारेश्वर भेजा। इस दौरान सेवा भारती के जीतू पटेल, सुमित पटेल, पवन साद, खंडवा से आए नागेश वालंजकर, भाकिसं के सुभाष पटेल, चिंटू पटेल, तन्मय पटेल, गुड्डू पटेल का सहयोग रहा।
एक एकड़ पर 70 हजार की लागत
भाकिसं जिला युवा संयोजक सुभाष पटेल ने बताया कि मौसम की मार से खराब हुए तरबूज की फसल की लागत भी किसानों को नहीं मिल पा रही है। एक एकड़ में 35 हजार का बीज और अन्य खर्च मिलाकर 70 हजार रुपए की लागत होती है। दो माह की फसल है, एक एकड़ में करीब 15 टन तरबूज निकलता है। 10 रुपए किलो के भाव से बिकने पर डेढ़ लाख रुपए किसान को मिलते है, जिसमें लागत निकालकर 70 से 80 हजार रुपए किसान दो माह में कमा लेता है। इस बार ऐसा नहीं हो पाया। तरबूत का साइज छोटा होने से करीब 5 से 7 टन ही उत्पादन हुआ, उसमें भी भाव दो से तीन रुपए किलो मिला।

harinath dwivedi Editorial Incharge
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