scriptHow voters reach the center here in MP | मप्र में यहां केंद्र तक कैसे पहुंचे वोटर, जानकर आप भी रह जाएंगे दंग | Patrika News

मप्र में यहां केंद्र तक कैसे पहुंचे वोटर, जानकर आप भी रह जाएंगे दंग

-केंद्र व गांव के बीच नदी, पार करने के लिए लोगों ने ड्यूब पर बांधी खटिया, रस्सी के सहारे मत का दान करने पहुंचे

खरगोन

Updated: July 02, 2022 09:58:14 am

खरगोन.
चुनाव बहिष्कार के किस्से हमने कई जगह सुने हैं। कई बार लोग वोट देने की प्रक्रिया को महत्व भी नहीं देते। ऐसे लोगों को मप्र के खरगोन जिले के छोटे से गांव खेड़ी के वोटरों से वोट का महत्व सीखना चाहिए। दरअसल बड़वाह ब्लॉक की ग्राम पंचायत बासवा के तहत आने वाला गांव खेड़ी ऐसी जगह बसा है जहां आसपास नदी है। शुक्रवार को यहां दूसरे चरण का मतदान हुआ। खेड़ी गांव के 190 वोटरों के लिए खनगांव में केंद्र बनाया गया। यहां तक पहुंचने के लिए वोटर को जान जोखिम में डालकर पहुंचे। दरअसल दोनों गांवों के बीच बांकुड़ नदी है। पुल न होने से ग्रामीणों ने जुगाड़ के जरिए नदी पार की।
बड़े से ट्यूब पर खटिया को बांधकर रस्सी के सहारे नदी पार की और अपने मत का दान किया। मतदाता बोले- लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हर बार चुनाव मेंइ सी तरह जान जोखिम में डालकर मतदान करते हैं। जवाबदार हमारी सूध नहीं लेते और जनप्रतिनिधि वोट लेकर मुंह फेर लेते हैं। ट्य़ूब व खटिया के सहारे नदी पार कर मतदान करने के लिए खनगांव पहुंची कड़वीबाई टूकडिय़ा, रीना मंगत, लक्ष्मी चेतराम अनईबाई किशोर ने बताया वोट डालने ही नहीं, सामान्य दिनों में भी खनगांव तक पहुंचने के लिए इसी तरह जोखिम लेकर नदी पार करते हैं।
How voters reach the center here in MP
खरगोन. मतदान के लिए कुछ इस तरह ट्य़ूब पर खटिया बांध नदी पार कर केंद्र तक पहुंचे मतदाता।
लोकसभा चुनाव में खनगांव, खेड़ी के लोगों ने किया था बहिष्कार
नदी पर पुल बनाने व इंदौर-इच्छापुर हाइवे से गांव तक सड़क बनाने की मांग को लेकर खनगांव व खेड़ी के करीब 423 वोटरों ने बीते लोकसभा चुनाव का बहिष्कार किया था। अफसरों की मान-मनौव्वल के बाद महज दो वोट पड़े थे। ग्रामीणों ने बताया यह छोटा चुनाव है और मांगे बड़ी है लिहाजा बहिष्कार नहीं करेंगे। दोनों गांवों के लोगों ने मतदान में उत्साह दिखाया और वोटिंग की।
आठ साल पहले मिली नाव, चलाते नहीं आई
ग्रामीणों ने बताया नदी पर पुल बनाने को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जब भी चुनाव में बहिष्कार की चेतावनी देते हैं, जवाबदार विकल्प लेकर आते हैं। आठ साल पहले प्रशासन की ओर से नाव मिली, लेकिन चलाते किसी को नहीं आया। नाव पलटी भी थी। इसके बाद यह विकल्प भी फैल हो गया।

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