...विपरीत हालात में भी दौड़े सफलता की राह पर

विश्व विकलांग दिवस पर विशेष: राजस्थान दिव्यांग क्रिकेट टीम से जुड़े हैं अजमेर जिले के तीन दिव्यांग खिलाड़ी

 

By: Amit

Updated: 03 Dec 2019, 08:44 PM IST

मदनगंज-किशनगढ़.
जीवन में कई बार ऐसे हादसे होते है। जिनसे जिन्दगी पूरी तरह बदल जाती है। लेकिन कई बार ऐसे हादसे ही सफलता की राह खोलते है। विपरीत परिस्थितियों के बाद भी ऊंची उड़ान को प्रोत्साहित करती है। हम बात कर रहे है दिव्यांगों की कुछ ऐसी ही कहानियों की।
किशनगढ़ तहसील के खातौली निवासी बोदू खां की गांव में ही चाय की केबिन है। उनका चौथे नंबर बेटा हुसैन जब करीब तीन-चार साल का था तो उसे तेज बुखार हुआ। इस दौरान उसे इजेक्शन लगाया गया। जिसके रिएक्शन से उसका एक पैर रह गया। इसके बाद हुसैन का चलना फिरना बंद हो गया। परिवार पर इस हादसे का गहरा आघात हुआ। नसिर दूसरे बच्चों को खेलता-दौड़ता देखता तो उसे भी खेलने की इच्छा होती। क्रिक्रेट से उसका शुरू से लगाव था। लेकिन अपने पैरों को देखकर वह निराश हो जाता। इसके बाद हुसैन ने गांव में ही बच्चों के साथ खेलना शुरू किया। स्कूल से आने के बाद वह क्रिकेट खेलता। वह सामान्य बच्चों से भी अच्छा खेलने लग गया। उसकी बैटिंग के चर्चे दूर-दूर तक होने लगे। वह गांव के अलावा दूसरी टीमों से भी खेलने लग गया। हाल ही में वह दिव्यांग क्रिकेट टीम में शामिल हुआ। 30 नवम्बर को जयपुर में जम्मू कश्मीर के खिलाफ खेले पहले मैच में उसने 86 रन बनाए। मैन ऑफ द मैच का खिताब भी उसके ही नाम रहा। जब वह क्रिकेट नहीं खेलता तो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। पिता का हाथ बंटाता है।

करंट से चला गया था हाथ
नसीराबाद क्षेत्र के बिठूर क्षेत्र का निवासी नसिर खान के पिता किसान है। घर में पशु होने के कारण नासिर उन्हें चराने के लिए जंगल में ले जाता। एक दिन जब नसिर भेड़-बकरिया चराने गया तो इस दौरान एक खम्बे पर चढ़ कर पशुओं की निगरानी करने लगा। इसी बीच 11 केवी की लाइन में सप्लाई प्रारंभ हो गई। इस हादसे में उसका एक हाथ चला गया। 9 साल के नसिर और उसके परिवार पर इस हादसे का गहरा आघात हुआ। उसका दिन यहां वहां खेलने में बीत जाता। क्रिक्रेट खेलने के दौरान धीरे-धीरे उसकी पकड़ गेंद पर ऐसी हो गई कि वह तेज गेंदबाज बन गया। अब तक कई अंतरराष्ट्रीय टूनामेन्ट भी खेल चुका है।
अजमेर निवासी दुर्गेश शर्मा एक निजी कंपनी में मैनेजर थे तो एक दिन कॉलेज छात्राओं के साथ कंपनी का मैच हुआ। लेकिन इस मैच में दुर्गेश को लेने से इंकार कर दिया गया। क्योंकि वे एक पैर से दिव्यांग है। लेकिन दर्गुेश के यह बात ऐसी लग गई कि उन्होंने उस दिन से दिव्यांगों की टीम बनाने की टीम ठान ली। वे हर रविवार को दिव्यांगों को एकत्र करते और क्रिकेट खेला करते थे। दुर्गेश पहले से भी अच्छे खिलाड़ी थे। इस बीच 2008 के बाद मंदी में उनकी नौकरी चली गई। तो दुर्गेश दिन में पिता की पान दुकान पर हाथ बंटाते और सुबह व शाम को टीम तैयार करते। इस मेहनत का उन्हें फल भी मिला। उन्होंने राज्य स्तर पर कई टूर्नामेन्ट जीते। वर्तमान में वह राजस्थान दिव्यांग टीम के मैनेजर है। अब तक सिंगापुर, मलेशिया, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका में खेल चपके है।
-कमजोरी को बनाया हिम्मत
दिव्यांगों ने अपनी शारीरिक कमजोरी को हिम्मत बनाया। मेहनत और लगन से एक मुकाम पाया।
एक्सपर्ट व्यू
जब किसी में दिव्यांगता होती है। तो उसमें कई दूसरी स्किल विकसित हो जाती है। जैसे जो लोग देख नहीं सकते है। उनकी सूंघने और आवाज पहचानने की शक्ति काफी तेज हो जाती है। वे लोगों को आवाज से पहचान लेते है। इसी तरह मूक व बधिर लोगों की स्मरण शक्ति तेज होती है। वही किसी के पैरों में कुछ कमी रह जाती है तो उसके हाथ ज्यादा बेहतर काम करना शुरू हो जाते है। इससे उनमें एक अलग स्किल का विकास हो जाता है।
रामअवतार चौधरी, दिव्यांगों से संबंधित एनजीओ के संचालक

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Amit Desk/Reporting
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