देश के 5 करोड़ आभूषण कारीगरों की कला दांव पर

कोरोना ने सोने पर बेहतरीन नक्काशी करने वाले कारीगरों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। सोने से लेकर आर्टिफिशियल ज्वैलरी बनाने वाले करीब पांच करोड़ कारीगरों की कला दांव पर लग गई है। विकल्प के अभाव में किसी को सौ दिन रोजगार के तहत गड्ढे खोदते देखा जा रहा है तो किसी को नाली बनाते। पश्चिम बंगाल के हावड़ा के बेलूर के रमेश सोनी को भला कौन भूल सकता है, जो अपने तथा अपने परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए रिक्शा खींच रहे हैं।

By: Rabindra Rai

Updated: 20 Jul 2020, 06:22 PM IST

पेट की आग बुझाने कोई खोद रहा गड्ढा तो कोई खींच रहा रिक्शा
रोजगार पर संकट के चलते तीन लाख से अधिक बदल चुके हैं धंधा
रवीन्द्र राय
कोलकाता. कोरोना ने सोने पर बेहतरीन नक्काशी करने वाले कारीगरों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। सोने से लेकर आर्टिफिशियल ज्वैलरी बनाने वाले करीब पांच करोड़ कारीगरों की कला दांव पर लग गई है। विकल्प के अभाव में किसी को सौ दिन रोजगार के तहत गड्ढे खोदते देखा जा रहा है तो किसी को नाली बनाते। पश्चिम बंगाल के हावड़ा के बेलूर के रमेश सोनी को भला कौन भूल सकता है, जो अपने तथा अपने परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए रिक्शा खींच रहे हैं। इस तरह महानगर के गिरीश पार्क इलाके में बांग्ला भाषी कारीगर को चाय बेचते देखा जा रहा है। ये कुछ चंद उदाहरण हैं, न जाने देश में कहां कहां रमेश जैसे कारीगरों को अपनी आजीविका चलाने के लिए क्या कुछ नहीं करना पड़ रहा है। बदले हुए हालात और रोजगार पर संकट के चलते करीब तीन लाख कारीगर अपना धंधा बदल चुके हैं। कोई ई रिक्शा चल रहा है तो चश्मे की दुकान तो कोई फैक्ट्री में काम कर रहा है।
अखिल भारतीय स्वर्णकार विकास परिषद के राष्ट्रीय मंत्री त्रिलोकी नाथ वर्मा कहते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी ने इस कारोबार की रफ्तार रोक दी, फिर देश में आर्थिक सुस्ती और कोरोना काल ने धंधे को और चौपट कर दिया। देश के प्रमुख ज्वैलरी केंद्रों में शुमार मेरठ में पच्चीस से तीस फीसदी कारीगर रोजगार गंवा चुके हैं। कॉरपोरेट घरानों के इस क्षेत्र में आने से बेरोजगारी और बढ़ गई है। जहां पहले सौ कारीगर काम करते थे, उन्नत मशीन के जरिए चंद कारीगरों से काम चलाया जा रहा है।
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हर कारीगर को मिले पहचान पत्र
अखिल भारतीय स्वर्णकार विकास परिषद के महासचिव श्रवण कुमार सोनी ने पत्रिका को बताया कि कारीगरों पर बढ़ते संकट के लिए सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार हैं। केन्द्र सरकार ने हमारे लिए कोई योजना नहीं बनाई। वर्षों से अपील के बाद इस उद्योग से कपड़ा मंत्रालय से जोड़ा गया। हम अपनी समस्याओं को लेकर प्रधानमंत्री को अवगत करा चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पहल नहीं हो रही है। कोलकाता के बऊ बाजार में प्रस्तावित सार्वजनिक सुविधा केन्द्र (सीएफसी) हर बड़े शहर में जरूरी है। हस्तनिर्मित आभूषणों के निर्माण में लगे सभी कारीगरों को पहचान पत्र देने की जरूरत है।
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उद्योग के समक्ष कई समस्याएं
इंडियन ज्वेलर्स फोरम के चेयरमैन राकेश कुमार ने बताया कि आभूषण उद्योग इन दिनों कई समस्याओं से जूझ रहा है। अब सबसे बड़ी समस्या अगले साल से आभूषण पर हॉलमार्क अनिवार्य करने को लेकर है। सवाल यह है कि देश के गांव-कस्बे के आसपास कितने हॉलमार्किंग सेंटर हैं। कारोबारी कारोबार करेंगे या जान व माल जोखिम में डालकर सेंटर पहुंचेंगे। वे कहते हैं कि कोलकाता में बने ज्वेलरी पार्क से किसी को फायदा नहीं हुआ। सरकार को छोटे-छोटे क्लस्टर बनाने चाहिए। कारीगरों को तकनीकी प्रशिक्षण मिले, बैंकों को बड़े के मुकाबले छोटे व्यवसायियों को ऋण मुहैया कराना चाहिए।

Rabindra Rai Editorial Incharge
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