लोकायुक्त के दायरे से मुख्यमंत्री बाहर

राज्य विधानसभा में कल बिल पेश करेगी राज्य सरकार

By: MANOJ KUMAR SINGH

Published: 24 Jul 2018, 11:29 PM IST

लोकायुक्त संबंधित केन्द्रीय कानून में लोकायुक्त को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे आरोपों की जांच करने के अधिकार देने का प्रावधान है। केन्द्रीय कानून का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने बिल में मुख्यमंत्री पद को लोकायुक्त के दायरे से बाहर रखा है।
कोलकाता

भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगाम लगाने के लिए आखिरकार राज्य सरकार ने विधानसभा में गुरुवार को लोकायुक्त बिल पेश का फैसला किया है। हालांकि इस बिल के दायरे से मुख्यमंत्री को बाहर रखा गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सदन में इस दौरान अपना वक्तव्य रखेंगी। इससे पहले सरकार इस बिल को पिछले साल विधानसभा में पेश करने वाली थी, लेकिन आखिर में इसे वापस ले लिया था। उक्त बिल पास होने पर राज्य सरकार लोकायुक्त नियुक्त करेगी। लोकायुक्त संबंधित केन्द्रीय कानून में लोकायुक्त को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर लगे आरोपों की जांच करने के अधिकार देने का प्रावधान है। केन्द्रीय कानून का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने बिल में मुख्यमंत्री पद को लोकायुक्त के दायरे से बाहर रखा है।
पहली बार लागू किया महाराष्ट्र ने

देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाले प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने स्वीडन के ओम्बड्समैन की तरह व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की थी, जिसके तहत केन्द्र लोकपाल और राज्य लोकायुक्त नियुक्त कर सकता है। इसके बाद देश में पहली बार ओडिशा सरकार ने अपने राज्य में लोकायुक्त व्यवस्था शुरू की, लेकिन वह लागू नहीं कर सकी। उसके बाद वर्ष 1973 में महाराष्ट्र सरकार ने इसे लागू करने वाला देश का पहला लोकायुक्त वाला राज्य बन गया।

ये अधिकार
लोकायुक्त किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री, विधायक, चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के सामान्य या निर्दिष्ट स्वीकृति से किसी भी सरकारी अधिकारी की ओर से की गई कार्रवाई की जांच कर सकता है। वह किसी प्राधिकरण और बोर्ड के सदस्यों की ओर से दिए गए निर्देश पर सरकारी अधिकारियों की कार्रवाई की भी जांच कर सकता है और उसका खुलासा कर सकता है। लोकायुक्त सरकारी और मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार, पक्षपात, अन्याय और भाई-भतीजावाद करने संबंधित आरोपों की जांच कर सकता है, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों के कार्यालय और ठिकानों पर छापा मार सकता है या छापेमारी का वारंट जारी कर सकता है। सीपीसी 1980 के तहत उक्त मामले में लोकायुक्त को पेश होने के लिए किसी को समन जारी करने, पेश किए गए दस्तावेजों की जांच करने सहित वो सभी अधिकार प्राप्त होता है, जो सिविल कोर्ट को प्राप्त है। लेकिन सिविल और क्रिमिनल कोर्ट के जजों, विधानसभा अध्यक्ष, अकाउंटेन्ट जनरल, चेयरमैन और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को लोकायुक्त के दायरे से बाहर रखा गया है।

MANOJ KUMAR SINGH
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned