अन्न से ही मन बनता- गुलाब कोठारी

मानवीय विकास में अध्यात्म और आयुर्वेद की भूमिका पर सेमिनार -----कल्याणमल राजमल पाटनी सिद्ध चेतना ट्रस्ट, श्रीअग्रसेन स्मृति भवन कोलकाता और श्रीमंगल आयुर्वेदिक फार्मेसी, सरदारशहर (राजस्थान) का संयुक्त आयोजन

By: Shishir Sharan Rahi

Published: 10 Mar 2019, 06:27 PM IST

कोलकाता. आज जीवन में रस नहीं है। मनुष्य जो भी चीज या भोजन का उपयोग करता है, उसका प्रभाव उसके मन पर निश्चित रूप से पड़ता है। इसलिए यह कहा जाता है...‘.....जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन’। मन से ही मन का पोषण होता है, न कि शरीर से। अन्न से ही मन बनता है इससे बड़ा प्रमाण और कुछ नहीं है। भारतीय चिंतन परंपरा प्रकृति से तालमेल रखते हुए जीवन जीने की सीख देती है। भोजन स्वस्थ शरीर और विकार रहित मन-बुद्धि का आधार है। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने रविवार को मानवीय विकास में अध्यात्म और आयुर्वेद की भूमिका पर आयोजित सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि यह उद्गार व्यक्त किए। कोलकाता के श्रीअग्रसेन स्मृति भवन में कल्याणमल राजमल पाटनी सिद्ध चेतना ट्रस्ट, श्री अग्रसेन स्मृति भवन कोलकाता और श्रीमंगल आयुर्वेदिक फार्मेसी, सरदारशहर (राजस्थान) के सहयोग से आयुर्वेद के जरिए विभिन्न रोगों के इलाज के लिए जारी 3 दिवसीय स्वास्थ्य शिविर के तहत इस सेमिनार का आयोजन किया गया था। कल्याणमल राजमल पाटनी सिद्ध चेतना ट्रस्ट के ट्रस्टी अशोक पाटनी ने सेमिनार की अध्यक्षता की। बतौर विशिष्ट अतिथि श्रीअग्रसेन स्मृति भवन के ट्रस्टी ओपी हरलालका, श्रीमंगल आयुर्वेदिक फार्मेसी, सरदारशहर के डायरेक्टर मुन्नालाल सेठिया और जयपुर स्थित नेशनल आयुर्वेदिक इंस्टीच्यूट के पूर्व निदेशक-सह-मशहूर आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. महेश शर्मा मंचासीन थे। संचालन रितिका पाटनी ने किया। इससे पहले गुलाब कोठारी का शॉल ओढ़ाकर और माला पहनाकर अभिनंदन किया गया। सेमिनार में आरंभिक उद्बोधन देते हुए उन्होंने आहार-विहार को शरीर के लिए जरूरी बताया। पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के समाज में बढ़ते दुष्प्रभाव पर कटाक्ष कर उन्होंने कहा कि शरीर-मन-बुद्धि हमारे साधन हैं। हम सब एक-दूसरे से बाहर नहीं हो सकते और यही रस है। किसी के मुरझाए चेहरे पर मुस्कान लाना ही जीवन का मूल मंत्र है।
-----फल, अनाज और दूध तक में पेस्टिसाइड्स

आज की शिक्षा में आत्मचेतना का अभाव है। आज पूरा देश-समाज सोशल मीडिया की चपेट में है और परिवार इसी के सीमित दायरे में बंधकर आज रह गया है। इससे बाहर निकलने की सख्त आवश्यकता है। आयुर्वेद की महता का बखान करते हुए कोठारी ने कहा कि आज इंसान जाने-अनजाने खुद की लापरवाही से दूसरे तरह की व्याधियों का शिकार हो रहा। उन्होंने शक्तिशाली कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग पर कटाक्ष कर कहा कि आज फल, अनाज और दूध तक में पेस्टिसाइड्स पाए जा रहे। यहां तक की सडक़ की मिट्टी तक भी इससे नहीं बची। आज जिस दौर से हम गुजर रहे वो भयानक है। और अगर समय रहते नहीं चेते तो घातक परिणाम होगा। आनेवाली पीढिय़ों को रोगों से मुक्त करना सबसे बड़ी चुनौती है। आज जिस तरह की शिक्षा बच्चों को दी जा रही है उसमें भारत की माटी यहां की मूल संस्कृति आदि के बारे में कोई पढ़ाई नहीं हो रही। उन्होंने रहा कि अपने अस्तित्व की तरफ लौटना बेहद जरूरी है। जिस माटी से हम निकले उसका सम्मान करना सीखें। भोजन स्वस्थ शरीर और विकार रहित मन-बुद्धि का आधार है, इसलिए अन्न की शुद्धता की महत्ता है। विकास और पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में आज हम अपनी मूल संस्कृति से अलग हो रहे, वैश्वीकरण ने जीवन को बाजार के हवाले कर दिया है और लालच के आगे जीवन का आज कोई मोल नहीं रहा। इस सबके दुष्परिणाम भी पूरी दुनिया के साथ मनुष्य भोग रहा है। कैंसर ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल के साथ गर्भनिरोधक गोलियां महिलाओं के लिए जानलेवा बनती जा रही है।
-----पशु से भी ज्यादा खाने लगा आज इंसान

सेठिया ने संबोधन में कहा कि गुलाब कोठारी की लेखनी और वाकपटुता पूरे देश के लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि पिछले २० साल से असाध्य रोगों के इलाज के लिए पत्रिका के साथ उनकी संस्था की ओर से आयुर्वेद शिविर लगाया जा रहा है। डॉ शर्मा ने आज समारोहों में अनाज की बर्बादी पर कहा कि समृद्धि हमारी आज हो गई तो इंसान पशु से भी ज्यादा खाने लगा।

Shishir Sharan Rahi Reporting
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