युवाओं को मानसिक रूप से क्यों? बीमार बना रहा सोशल मीडिया, जानिए यहां

GADGETS MAKE YOUTH LONELY N DEPRESSION: युवाओं को अकेला और अवसादग्रस्त बना रहे गैजट्स, सोशल मीडिया और इंटरनेट की आभासी दुनिया के मकडज़ाल में फंसा युवा, भयानक होते जा रहे हालात, मनोचिकित्सकों ने अभिभावकों को भी दोषी ठहराया

कोलकाता. आज के हाईटेक/डिजीटल युग में गैजेट्स (सोशल मीडिया) महानगर सहित प्रदेश के अन्य शहरों के युवाओं को अकेला और अवसादग्रस्त बना रहे हैं। हालात इस कदर भयानक होते जा रहे कि सोशल मीडिया और इंटरनेट की आभासी दुनिया के मकडज़ाल में फंसा आज का युवा मामूली-मामूली परेशानियों, रिजल्ट खराब होने और माता-पिता की डांट-फटकार पर खुदकुशी तक करने लगे हैं। 3 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया का उपयोग युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रहा है। युवाओं में व्हाट्स ऐप, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर जैसे कई सोशल मीडिया पर लगातार नजर गढ़ाकर बैठे रहना आजकल दिनचर्या के साथ-साथ उनके लिए सोशल स्टेट्स बन गया है। मनोचिकित्सकों ने इसके लिए कुछ हद तक अभिभावकों को भी दोषी ठहराते हुए कहा है कि आजकल के माता-पिता अब आधे से भी कम समय बच्चों के साथ बिताते हैं। अमेरिकी संगठन कॉमन सेंस मीडिया के सर्वेक्षण में यह खुलासा किया गया है कि खासकर 13 से 17 आयु वाले युवा दोस्तों से प्रत्यक्ष मिलने की जगह सोशल मीडिया और वीडियो चैट के जरिए संपर्क करना ज्यादा पसंद करते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि आज के माता-पिता भी अब कम समय बच्चों के संग गुजारते हैं जबकि आज से एक दशक पहले वे अधिक समय देते थे।

सोचने समझने की क्षमता पर असर
इंटरनेट की लत ने युवा पीढ़ी के दिमागी विकास, सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाला है। असल दुनिया से वे दूर हो निराशा, हताशा और अवसाद के शिकार बने रहे। कोलकाता के मनोचिकित्सकों नेे स्वीकार किया है कि सोशल मीडिया ने आज अभिभावकों और उनके बच्चों के बीच कम्युनिकेशन गैप पैदा कर दिया है, जिसे उन्होंने एक ऐसी लंबी खाई बताया जिसे भरने में काफी वक्त लगेगा। मनोचिकित्सकों का कहना है कि इसके चलते युवा डिप्रेशन के शिकार हो आत्महत्या तक कर रहे हैं। अधिकांश अभिभावकों ने भी स्वीकार किया कि उनके बच्चे सेलफोन और लैपटॉप पर अधिक समय बिताने के साथ उनसे बात तक नहीं कर रहे। महानगर में पिछले साल छात्रों की आत्महत्या ने इसकी पुष्टि की है कि युवाओं और माता-पिता के बीच संवाद की खाई चौड़ी हो गई है।

मनोचिकित्सकों ने ये बताया कारण
महानगर के एक प्रमुख अस्पताल के मनोवैज्ञानिक सलाहकार संजय गर्ग ने कहा कि समाज में तेजी से बदलाव, वेस्टर्न-सह-बदलती लाइफ स्टाइल्स और सोशल मीडिया पर हद से ज्यादा निर्भरता इसके लिए जिम्मेदार है। गर्ग ने कहा कि बच्चे अपनी परेशानियों और चिंताओं को तब तक अपने तक ही सीमित रखते हैं जब तक उनके हाथ से निकल न जाए। उन्होंने कहा कि आजकल के माता-पिता छुट्टियों के दौरान भी बजाए बच्चों संग समय गुजारने गैजेट्स के साथ अवकाश व्यतीत करना ज्यादा पसंद करते हैं। एक अन्य मनोचिकित्सक जे राम ने बताया कि साइबर-संवाद कभी भी आमने-सामने की बातचीत का विकल्प नहीं हो सकता खासकर परिवार के भीतर। कुछ आसान उपाय युवाओं में तनाव और अवसाद को दूर करने में मदद कर सकते हैं। उनके अनुसार जबतक माता-पिता बच्चों से बात कर उनकी परेशानियों को दूर नहीं करते तबतक वे यह नहीं जान पाएंगे कि वे (किशोर) डिप्रेशन के शिकार हैं, अकेलेपन में जी रहे या खुदकुशी की ख्याल उनके मनोमस्तिष्क में चल रहा। राम ने कहा कि बच्चों के साथ बातचीत करने के अलावा माता-पिता को बच्चों को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि वे हर परेशानी में उनकी मदद के लिए हरपल उपलब्ध हैं। ज्यादातर मामलों में माता-पिता युवाओं को फटकार लगाते हैं, जो बेहद खतरनाक है। एक मनोवैज्ञानिक ने एक ऐसी छात्रा की काउंसलिंग की जिसने गणित की परीक्षा में असफल होने के बाद आत्महत्या का प्रयास केवल इस इरादे से किया था क्योंकि उसे डर था कि उसके माता-पिता उसे डांटेंगे।

डराने वाले हालात
महानगर के 40 प्रतिशत युवाओं ने स्वीकारा कि सोशल मीडिया के कारण वे मित्रों से नहीं मिल पाते। 66 प्रतिशत संवाद के लिए वीडियो चैट, टेक्सट मैसेज को प्राथमिकता देते हैें। 89 प्रतिशत के पास स्मार्टफोन, 43 प्रतिशत फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं, जबकि 81 फीसदी युवाओं ने कहा कि ऑनलाइन आदान-प्रदान जीवन का जरूरी हिस्सा बन गया है और वे फोन-वीडियो कॉल के बिना नहीं रह सकते।

Shishir Sharan Rahi
और पढ़े
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned