ज्ञान का सार होता है आचार: आचार्यश्री महाश्रमण

ज्ञान प्राप्ति के बाद जो व्यक्ति हिंसा नहीं करना सीख गया मानों उसके जीवन में ज्ञान का सार आ गया

By: Arvind Mohan Sharma

Published: 15 Jan 2018, 11:57 AM IST

भुवनेश्वर (ओड़िशा)ः आचार्यश्री महाश्रमणजी ने वर्धमान समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को ज्ञान का सार बताते हुए कहा कि ज्ञान का सार है आचार। ज्ञान प्राप्ति के बाद जो व्यक्ति हिंसा नहीं करना सीख गया मानों उसके जीवन में ज्ञान का सार आ गया। जो ज्ञान अर्जन के उपरान्त आचार व व्यवहार में आ जाए, वह सार्थक होता है। दुनिया में ज्ञान से बड़ी कोई पवित्र चीज नहीं होती है, परन्तु ज्ञान-ज्ञान में फर्क होता है। एक ज्ञान आदमी को भौतिकता की ओर ले जाने वाला, सुख-सुविधावादी बनाने वाला, चोरी, हिंसा, झूठ की ओर ले जाने वाला तो दूसरा ज्ञान आदमी को वैराग्य, ध्यान , साधना व मोक्ष के मार्ग पर ले जाने वाला होता है। वैराग्य की ओर ले जाने वाला आध्यात्मिक ज्ञान होता है।

 

ज्ञानार्जन कर आदमी को अहिंसक बनने का प्रयास करना चाहिए
आदमी को सभी प्राणियों के प्रति मंगल मैत्री की विचारधारा रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी की ऐसी विचारधारा आध्यात्मिक और कल्याणकारी हो सकती है। ज्ञानार्जन कर आदमी को अहिंसक बनने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा की चेतना को अध्यात्म के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। सभी जीव जीना चाहते हैं। इसलिए आदमी को किसी भी जीव की हिंसा करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को जो व्यवहार अपने लिए अच्छा नहीं लगता, वैसा व्यवहार उसे दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। आदमी संयम, अहिंसा व मैत्रीपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त भुवेश्वरवासियों को अहिंसा यात्रा की अवगति प्रदान की और उनसे अहिंसा यात्रा के संकल्पों को स्वीकार करने का आह्वान किया तो उपस्थित भुवनेश्वरवासियों ने आचार्यश्री से अहिंसा यात्रा की संकल्पत्रयी स्वीकार की।

 


साध्वीप्रमुखाजी ने अपने कर्तृत्व, व्यक्तित्व व वैदुष्य से सेवा का अच्छा कार्य किया है
तेरापंथ धर्मसंघ की असाधारण साध्वीप्रमुखाजी के 47वें चयन दिवस के अवसर पर आचार्यश्री ने पावन उद्बोध प्रदान करते हुए कहा कि आज से 46 वर्ष पूर्व साध्वीप्रमुखाजी का मनोनयन हुआ था। एक अच्छा काल व्यतीत किया है। साध्वीप्रमुखाजी ने अपने कर्तृत्व, व्यक्तित्व व वैदुष्य से सेवा का अच्छा कार्य किया है। तीन गुरुओं को अपनी सेवा प्रदा करने वाली साध्वीप्रमुखाजी अपनी तीसरी पीढ़ी को सेवा दे रही हैं। साध्वीप्रमुखाजी समर्थ हैं। आप धर्मसंघ को लंबे समय तक सेवा देती रहें।
भुवनेश्वर प्रवास के दूसरे दिन आचार्यश्री का अभिनन्दन का कार्यक्रम भी समायोज्य था। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त उपस्थित भुवनेश्वरवासियों ने आचार्यश्री के अभिनन्दन के क्रम में सर्वप्रथम समणी कमलप्रज्ञाजी ने ओड़िया भाषा में गीत का संगान किया। उसके उपरान्त ओड़िशा से संबंधित साध्वीवृंद और समणीवृंद द्वारा भी गीत का संगान किया गया।

Arvind Mohan Sharma Desk
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