कोलकाता के दशकों पुराने अखाड़े में जीवंत है दांवपेंच

वर्जिश या शरीर शौष्ठव के प्राचीन भारतीय संस्करण अखाड़े अभी भी महानगर कोलकाता (kolkata) में जिंदा हैं। गिरीश पार्क के पास स्थित तारा सुंदरी व्यायामशाला में आज भी युवा, किशोर पंरपरागत पद्धति से कुश्ती के दांवपेंच सीख रहे हैं।

By: Paritosh Dube

Updated: 14 Jan 2021, 06:20 PM IST

कोलकाता. मुगदर, गदा, खंब, नाल जैसे पंरपंरागत व्यायाम उपकरणों के बीच 15 वर्षीय अजय दास तारा सुंदरी व्यायामशाला में नई पीढ़ी के पहलवानों को तैयार कर रहा है। उन्हें आइनों के सामने शरीर के वजन के मुताबिक डम्बल उठवाता है। बेंच प्लेस में लिटाकर वजन उठाना सिखाता है। बार में शरीर को मोडऩा संतुलन साधने का गुर बताता है। फिर अखाड़े की मुंडेर पर लगे बार में कसरत करवा कर अखाड़े की मिट्टी में दांव लडऩे के लिए तैयार करता है। उसके गुरू हनुमान मिश्रा पहलवान उसे बीच बीच में सही गलत का निर्देश देते हैं। जो उन्होंने उनके बाबा और पिता से दशकों में सीखे। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर निवासी हनुमान पहलवान बताते हैं कि उनके बाबा अलगू पहलवान आजादी से पहले ही बड़ाबाजार के तारा सुंदरी पार्क में अखाड़े की शुरुआत कर चुके थे। उस समय शरीर शौष्ठव के इच्छुक युवा बड़ी संख्या में अखाड़े में आते थे। उनके बाबा अलगू के कैंचिया और पांवमोजा दांव को दोखकर पहलवान दारा सिंह भी हतप्रभ हो गए थे। उन्होंने कहा था कि अलगू जैसी रांग यानि जांघ की मांसपेशियांं उन्होंने कभी नहीं देखीं।
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कोलकाता के दशकों पुराने अखाड़े में जीवंत है दांवपेंच

लंगोट से परहेज है नए पहलवानों को
पांच दशकों से पहलवानी कर रहे हनुमान पहलवान बताते हैं कि नई पीढ़ी के पहलवालों को लंगोट से परहेज है। वे नए तरीके के व्यायाम उपकरणों की मांग भी करते हैं। उनके बाबा ने अखाड़े में प्रशिक्षण को निशुल्क रखने का वायदा लिया था इसलिए वे अभी भी कसरत करने वालों से शुल्क नहीं लेते। सरकारी सहायता नहीं मिलती। निजी संसाधनों से अखाड़े का संचालन करते हैं।
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सुभाष चंद्र बोस आते थे अखाड़े
तारा सुंदरी व्यायामशाला से कई नामी पहलवानों का नाता रहा। यहां से अर्जुन सिंह, बचऊ, संगठा, भोला पहलवान जैसे नाम निकले। अभी दीनानाथ, बबऊ पहलवान नाम कमा रहे हैं। अखाड़े से नाता रखने वालों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम भी शामिल है।
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साइमन को दिखाया था काला झंडा
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मित्र पहलवान अर्जुन सिंह ने अंग्रेजों का विरोध करते हुए अंग्रेज अधिकारियों के आयोग साइमन कमीशन को हावड़ा ब्रिज पर काला झंडा दिखाया था। जिसके बाद अखाड़े में देशभक्त युवाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो गई।

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