भगवान महेश के आशीर्वाद से हुई माहेश्वरियों की उत्पत्ति

भगवान महेश के आशीर्वाद से हुई माहेश्वरियों की उत्पत्ति

Shishir Sharan Rahi | Updated: 04 Jun 2019, 03:05:57 PM (IST) Kolkata, Kolkata, West Bengal, India

माहेश्वरी सभा का महेश नवमी महोत्सव 11 को, सामूहिक रूद्राभिषेक, संगीतमय नृत्य-नाटिका

कोलकाता. माहेश्वरी सभा की ओर से माहेश्वरी जाति का जातीय पर्व महेश नवमी महोत्सव 11 जून को माहेश्वरी भवन में धूमधाम से मनाया जाएगा। महोत्सव के तहत सुबह ८.३० बजे मुख्य यजमान सत्यनारायण बाहेती की ओर से सपत्निक भगवान महेश का सामूहिक रूद्राभिषेक किया जाएगा। शाम ६.३० बजे समाज हित में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए डॉ. नरसिंह दास दम्मानी का अभिनंदन होगा। साथ ही माहेश्वरी वंशोत्पत्ति पर आधारित संगीतमय नृत्य-नाटिका और इसके बाद सहभोज का आयोजन होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता केशरीचंद डागा करेंगे। प्रधान अतिथि सत्यनारायण दरगड़ और प्रधान वक्ता रामरतन लाहोटी होंगे। सभा मंत्री पुरुषोत्तम दास मूंधड़ा ने बताया कि कार्यक्रम का संयुक्त संयोजक सत्यनारायण बाहेती, राकेश मोहता को बनाया गया है। आयोजन को सफल बनाने में सभा के पदाधिकारी, कार्यकारिणी और सभा सदस्य सक्रिय हैं।

भगवान महेश के आशीर्वाद से हुई माहेश्वरियों की उत्पत्ति
खण्डेलपुर राज्य के राजा खडग़लसेन ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिससे उनको सुजानसेन पुत्र प्राप्त हुआ। सुजानसेन का विवाह चंद्रावती के साथ हुआ। सुजानसेन को उतर दिशा में कभी भी नहीं जाने का कहा गया था, पर हठपूर्वक वह 72 उमरावों के साथ उतर दिशा में गए। वहां उन्हें श्रृंगी और दाधीच ऋषि यज्ञ करते मिले। सुजानसेन ने ऋषि-मुनियों के यज्ञ को विध्वंस कर दिया, जिसके कारण ऋषियों ने सुजानसेन व 72 उमरावों को श्राप देकर उन्हें पत्थर का बना दिया। जब सुजानसेन की पत्नी को यह जानकारी हुई तो उसने व 72 उमरावों की पत्नियों ने मिलकर शिव का ध्यान कर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न हो शिव-पार्वती प्रकट हुए और पार्वती के कहने पर शिव ने सभी उमरावों व सुजानसेन को जीवनदान दिया। महेश की ओर से जीवन दान मिलने के कारण ही ये माहेश्वरी कहलाए। माहेश्वरी समाजजनों को कभी-कभी मारवाड़ी या राजस्थानी भी लिखा जाता है। मान्यता के अनुसार माहेश्वरियों की उत्पत्ति (वंश) भगवान महेश के आशीर्वाद से हुआ, इसलिए महेश परिवार (भगवान महेश, पार्वती-गणेश) को माहेश्वरियों के (माहेश्वरी वंश के) कुलदेवता/कुलदैवत माना जाता है। माहेश्वरियों के धार्मिक स्थान को मंदिर (महेश मंदिर) कहते हैं। भारत की आजादी की लड़ाई और भारत की आर्थिक प्रगति में माहेश्वरियों का बहुत बड़ा योगदान है। जन्म-मरण विहीन एक ईश्वर (महेश) में आस्था और मानव मात्र के कल्याण की कामना माहेश्वरी धर्म के प्रमुख सिद्धान्त हैं। माहेश्वरी समाज सत्य, प्रेम और न्याय के पथ पर चलता है। शरीर को स्वस्थ-निरोगी रखना, कर्म करना (मेहनत और ईमानदारी से काम करना), बांट कर खाना और प्रभु की भक्ति (नाम जाप एवं योग साधना) करना इसके आधार हैं। माहेश्वरी अपने धर्माचरण का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते है तथा वह जिस स्थान, देश-प्रदेश में रहते है वहां की संस्कृति का पूरा आदर-सम्मान करते हैं।
आज दुनियाभर के कई देशों में और भारत के हर राज्य, हर शहर में माहेश्वरी बसे हंै और अपने अच्छे व्यवहार के लिए पहचाने जाते है। बिहार के मधुबनी जिले से 3 किलोमीटर उत्तर ग्राम अहमादा,पंचायत रघुनी देहट में मैथिल ब्राह्मण परिवार जिनका गोत्र काश्यप है भी माहेश्वरी को अपना कुलदेवी मानते हुए वर्षों से नियमित पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। ईसा पूर्व 3133 में महेश और महेश्वरी (पार्वती) की कृपा से माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी और तब भगवान महेश ने 6 ऋषियों (महर्षि पराशर, सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी, दाधीच) को माहेश्वरियों का गुरु बनाया और मार्गदर्शित करने का दायित्व सौंपा। कालांतर में इन गुरुओं ने ऋषि भारद्वाज को भी माहेश्वरी गुरु पद प्रदान किया जिससे माहेश्वरी गुरुओं की संख्या 7 हो गई जिन्हें माहेश्वरीयों में सप्तर्षि कहा जाता है। सप्तगुरुओं ने महेश और महेश्वरी की प्रेरणा से इस अलौकिक पवित्र माहेश्वरी निशान और ध्वज का सृजन किया। इस निशान को मोड़ कहा जाता है जिसमें एक त्रिशूल और त्रिशूल के बीच के पाते में एक वृत्त तथा वृत्त के बीच (प्रणव) होता है। माहेश्वरी ध्वजा पर भी यह निशान अंकित होता है। केसरिया रंग के ध्वज पर गहरे नीले रंग में यह पवित्र निशान होता है, इसे दिव्यध्वज कहते हैं। गुरुओं का मानना था कि यह निशान और ध्वज सम्पूर्ण माहेश्वरी को एकत्रित रख आपस में एक-दूसरे से जोड़े रखता है।
--माहेश्वरी का बोधवाक्य सर्वे भवन्तु सुखिन है।
केवल माहेश्वरियों का नहीं बल्कि सर्वे (सभी के) सुख की कामना करनेवाला तथा सत्य, प्रेम, न्याय का उद्घोषक यह माहेश्वरी निशान अर्थपूर्ण है।

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