पूर्वी हिमालय क्षेत्र से विलुप्त होने की कगार पर रेड पांडा

भारत के पूर्वी हिमालय क्षेत्र में रहने वाले रेड पांडा लुप्तप्राय पशु होने के बावजूद इनके संरक्षण पर जोर नहीं दिया जा रहा है। जबकि देश में मात्र तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में ही रेड पांडा पाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में भी मात्र दार्जिलिंग के हिमालय क्षेत्र में यह रहना पसंद करते हैं।

By: Rabindra Rai

Published: 22 Nov 2020, 05:57 PM IST

भारत में पश्चिम बंगाल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में ही पाए जाते हैं यह पशु
1996 में शुरू हुई थी संरक्षण के लिए परियोजना
देश में ही नहीं दुनिया में कम हो रही तादाद
कोलकाता
भारत के पूर्वी हिमालय क्षेत्र में रहने वाले रेड पांडा लुप्तप्राय पशु होने के बावजूद इनके संरक्षण पर जोर नहीं दिया जा रहा है। जबकि देश में मात्र तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में ही रेड पांडा पाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में भी मात्र दार्जिलिंग के हिमालय क्षेत्र में यह रहना पसंद करते हैं। फिर भी इस गंभीर खतरे वाले पशु के संरक्षण के लिए कोई सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं जिससे इनकी संख्या में दिनोंदिन गिरावट आती जा रही है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि लाल पांडा की दो प्रजातियां हैं एक चीनी (ऐल्यूरस स्टाइलानी) और दूसरी हिमालयन रेड पांडा (आयिलस फुलगेन्स)। भारत के अलावा यह चीन, नेपाल, भूटान और उत्तरी म्यांमार में भी पाए जाते हैं। दुनिया में रेड पांडा की आबादी लगभग 10 हजार हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या ढाई हजार ही रह गई हैं। मेघालय पठार से रेड पांडा की उपस्थिति की कोई रिपोर्ट नहीं है। भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 के तहत पशु की रक्षा की जाती है।
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दुनियाभर में हाल खराब
वन्यजीव संरक्षण के लिए कार्यरत गैर-सरकारी ट्रैफिक के अनुसार भूटान में लाल पांडा से संबंधित अपराध सबसे कम पाए गए हैं जबकि नेपाल से महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज की गई हैं। भारत में भी रेड पांडा का लक्षित व गैर-लक्षित अवैध शिकार होता रहा है। इस वन्यजीव अपराध में मुख्य रूप से फर के उत्पाद का व्यापार शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार नेपाल में रेड पांडा का अवैध शिकार अभी भी प्रचलित है।
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दिखाना भी दुर्लभ
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि रेड पांडा को लेजर पांडा, रेड कैट-बियर और रेड बियर-कैट भी कहा जाता है। जंगल में इन्हें देख पाना बेहद दुर्लभ होता है। रेड पांडा का औसत जीवनकाल 23 वर्ष है, लेकिन मादाएं 12 वर्ष की आयु के बाद प्रजनन करना बंद कर देती हैं। रेड पांडा मांसाहारी होने के बावजूद बांस के अंकुर, मशरूम, जड़, घास और लाइकेन आदि खाते हैं। कभी-कभी पक्षियों, अंडों, मछलियों, छोटे स्तनधारियों और कीड़ों को भी अपना आहार बनाते हैं।
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शिकार की कई घटनाएं दर्ज
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक मुकेश ठाकुर के अनुसार विगत तीन पीढिय़ों की तुलना में रेड पांडा की आबादी 50 प्रतिशत कम हो गई है। जबकि अगली तीन पीढिय़ों में भी यह गिरावट और तीव्र होने का अनुमान है। पूर्वोत्तर भारत में पिछले दो वर्षों के क्षेत्र सर्वेक्षण में रेड पांडा के अवैध शिकार की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं।
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दुनिया में संख्या बढ़ाने के प्रयास
रेड पांडा पर शोध कर रहीं अवंतिका आधरूज का कहना है कि भारत में रेड पांडा की स्थिति अब बहुत अच्छी नहीं है। यह विलुप्त प्रजाति में शामिल होता जा रहा है। वर्तमान में भारत के जंगलों में इसकी संख्या लगभग ढाई हजार ही बची है। इसकी संख्या को बढ़ाने के लिए देश नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। अगर चिडिय़ाघर में इनके मन मुताबिक आवास विकसित किया जाए तो इसकी संख्या बढ़ाई भी जा सकती है।

Rabindra Rai Editorial Incharge
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