समाज व राष्ट्र सेवा का संकल्प जरूरी: संत राघव दास

हमारे जीवन का लक्ष्य संस्कृति, सनातन धर्म की रक्षा, गो सेवा तथा समाज की सेवा करना होना चाहिए। युवा पीढ़ी को इसे अपना दायित्व समझना चाहिए तथा इस बात को ध्यान में रखकर जीवन पथ पर अग्रसर होना चाहिए। यह कहना है संत राघव दास महाराज का। हाल में भागवत कथा के लिए महानगर पधारे संत ने राजस्थान पत्रिका से बातचीत करते हुए समाज को सकारात्मक संदेश दिया।

By: Rabindra Rai

Published: 21 Jan 2021, 06:09 PM IST

जीवन का लक्ष्य संस्कृति, सनातन धर्म की रक्षा, गो सेवा का हो
संत ने पत्रिका से बातचीत में समाज को दिया सकारात्मक संदेश
कोलकाता. हमारे जीवन का लक्ष्य संस्कृति, सनातन धर्म की रक्षा, गो सेवा तथा समाज की सेवा करना होना चाहिए। युवा पीढ़ी को इसे अपना दायित्व समझना चाहिए तथा इस बात को ध्यान में रखकर जीवन पथ पर अग्रसर होना चाहिए। यह कहना है संत राघव दास महाराज का। हाल में भागवत कथा के लिए महानगर पधारे संत ने राजस्थान पत्रिका से बातचीत करते हुए समाज को सकारात्मक संदेश दिया। अयोध्या में जन्म लेने के बाद 10 साल की उम्र में ही वृंदावन जाकर गुरु दीक्षा लेने वाले 30 वर्षीय राघव दास ने बताया कि मेरी रुचि बचपन से ही समाज सेवा और गो सेवा की रही है। समाज के उत्थान के लिए मैं हमेशा ही प्रयासरत रहता हूं। नगर को जगाता हूं। लोगों को जागरूक करता हूं। उन्होंने कहा कि आजकल भागदौड़ की जिंदगी में कई लोग काम धंधे के चक्कर में तथा परिवार के भविष्य को लेकर धर्म के पथ से धीरे-धीरे हट रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में युवा पीढ़ी को धर्म का आश्रय लेते हुए परिवार, समाज के साथ राष्ट्र सेवा का संकल्प लेना चाहिए, तभी वह व्यक्ति राष्ट्र निर्माण में असली भागीदारी निभाएगा। समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए कोई उम्र नहीं होती है। तन मन धन से हर व्यक्ति को सेवा कार्य में लगे रहना चाहिए। इसी में सभी की भलाई है।
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आया जीवन में परिवर्तन
यह पूछे जाने पर आपने सांसारिक जीवन को छोड़कर वैराग्य जीवन को क्या अपनाया? राघव दास ने बताया कि जब मैं दस साल का था तब एक दिन मेरे पिताजी ने कहा कि जो तुम खाते हो मैं तुम्हें खिलाता हूं। इस पर मैंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का खाता है। इस पर उन्होंने कहा कि ठीक है कल से अपना भाग्य आजमा कर दिखाओ। इस बात पर मैंने घर छोडऩेे का निश्चय किया। मैं वृंदावन आ गया। कुछ समय बाद मेरे पिताजी और मां मुझे लेने आश्रम में आए। मैंने घर लौटने से इनकार कर दिया। तब अकेले में मां ने कहा कि ठीक है बेटा, तुम जहां रहना चाहते हो रहो, पर जिस दिन तुम्हारा मन घर लौटने को करे, तुम आ जाना। इसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैंने गुरु दीक्षा ली, वाराणसी के वेंकटेश विद्यालय में संस्कृत तथा फिर कॉलेज में पढ़ाई की। मुझे गोल्ड मेडल मिला।
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भाग्य निष्ठ नहीं कर्म निष्ठ बनें
संत राघव दास ने समाज को संदेश देते हुए कहा कि देश में जात पात की दीवार नहीं होनी चाहिए। सभी जाति के लोगों को मिलकर सनातन धर्म को आगे बढ़ाना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलते हुए प्रत्येक व्यक्ति को भाग्य निष्ठ नहीं बल्कि कर्म निष्ठ बनना चाहिए। गो वंश के वध को रोकना चाहिए। इस संबंध में समाज के लोगों को जागरूक होने की आवश्यकता है। प्रत्येक हिन्दू को एक गो की सेवा का संकल्प लेना चाहिए। गाय के साथ नंदी (वृषभ) की भी सेवा करनी चाहिए, क्योंकि वृषभ बचेंगे तभी गोवंश आगे बढ़ेगा।
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हर व्यक्ति का शिक्षित होना जरूरी
संत राघव दास ने शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर व्यक्ति का शिक्षित होना जरूरी है। अशिक्षा के कारण ही समाज में अराजकता, कुरीति फैलती है। शिक्षा के साथ व्यक्ति का स्वस्थ होना भी जरूरी है। स्वस्थ रहने के लिए नियमित दिनचर्या और योग-ध्यान को जीवन में महत्व दें।

Rabindra Rai Editorial Incharge
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